प्रेम और नफ़रत
प्रेम वह शक्ति है जो जीवन को जोड़ती है और नफ़रत वह आग है जो उसे भस्म कर देती है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मुस्कान होती है; जहाँ नफ़रत होती है, वहाँ विनाश। इसलिए प्रेम बाँटिए, नफ़रत छोड़िए क्योंकि प्रेम ही सच्ची मानवता है।

प्रेम वह शक्ति है जो जीवन को जोड़ती है और नफ़रत वह आग है जो उसे भस्म कर देती है। जहाँ प्रेम होता है, वहाँ मुस्कान होती है; जहाँ नफ़रत होती है, वहाँ विनाश। इसलिए प्रेम बाँटिए, नफ़रत छोड़िए क्योंकि प्रेम ही सच्ची मानवता है।
संदेह हर बार अविश्वास से नहीं, बल्कि संवाद की कमी से जन्म लेता है। जब शब्द थक जाते हैं और मौन लंबा हो जाता है, तब मन कल्पनाओं से भर जाता है। पर यदि हम सच से संवाद करें, तो संदेह भी संबंध को सुधारने का अवसर बन सकता है। क्योंकि प्रेम का अर्थ अंधविश्वास नहीं, बल्कि समझ और सच्चाई में विश्वास है।
उसने आवाज दी, और मैं चल पड़ी—अपनी भावनाओं की गठरी उठाए हुए। पास पहुंचने पर जाना कि उसके मन की हर गली कितनी सँकरी है, हर कोना कितना सीमित। उन सँकरी गलियों में चलते-चलते मैं खुद भी सिकुड़ गई। चारों ओर अँधेरा था, और मैं उसी अँधेरे में भटकती हुई आखिरकार उसके पास पहुँची। वह वहाँ था. खुश, बेफिक्र और अपने आप में मशगूल। न उसे मेरा इंतज़ार था, न मेरी कोई ज़रूरत। तब एहसास हुआ जहाँ ज़रूरत नहीं, वहाँ ठहरना नहीं चाहिए। मगर लौटने का रास्ता तो मैं भूल चुकी थी। अब वही सवाल मन में गूंजता है मैं क्या करूँ? इस भावनाओं की गठरी का बोझ कैसे उठाऊँ?
हम जैसा सोचते हैं, वैसा ही देखने और मानने लगते हैं। यही प्रवृत्ति “कंफर्मेशन बॉयस” कहलाती है। सच्चाई चाहे कुछ भी हो, हमारा दिमाग उसे उसी रूप में देखना चाहता है जैसा हम मानते हैं। यही कारण है कि किसी व्यक्ति, विचार या विचारधारा से जुड़ने के बाद हम उसकी गलतियाँ भी नजरअंदाज कर देते हैं। असल में दिक्कत सच्चाई में नहीं होती दिक्कत हमारे देखने के “चश्मे” में होती है। कई बार दाग हकीकत में नहीं, चश्मे पर ही होते हैं।
-किशनचंद चेल्लाराम (केसी) कॉलेज का प्रतिष्ठित इंटर कॉलेजिएट फेस्ट किरण सिर्फ एक फेस्ट नहीं रह गया है, बल्कि अपने समय की एक ऐसी उत्कृष्ट सांस्कृतिक प्रस्तुति बन चुका है, जिसे हर वर्ष विद्यार्थी, शिक्षक और प्रतिभागी लंबे समय तक याद रखते हैं. एन.एच.एस.आर.ई. की डायरेक्टर और एचएसएनसी यूनिवर्सिटी की वाइस चांसलर कर्नल प्रो. डॉ. हेमलता बागला ने कहा कि हर तरफ त्यौहारों का माहौल है,
कहानी एक सफल लेकिन अकेले हो चुके इंसान— रविन्द्र के दर्द को दिखाती है। महंगे बंगले, नाम, शोहरत और पैसा होने के बावजूद वह अंदर से टूट चुका है, क्योंकि उसकी माँ अब नहीं रही। उसने माँ से वादा किया था कि उसे हर सुख देगा, पर उसी “बड़े मकान की दीवारों” ने बेटे और माँ के बीच दूरी बना दी। माँ शायद आख़िरी वक़्त में दर्द में थी, पर रविन्द्र को पता न चला क्योंकि “दीवारों” ने आवाज़ और अहसास रोक लिए।रविन्द्र आज पछता रहा है कि असली घर प्यार और साथ से बनता है, दीवारों से नहीं।यही दर्द और पछतावा पूरी कहानी का मूल है।
ज़िंदगी कोई साधारण चीज़ नहीं, यह भावनाओं, यादों, रिश्तों और एहसासों का कुल योग है। यह क़ीमती भी है, तकलीफ़देह भी है, लेकिन हर पल हमारे बहुत पास है।
रक्षा उपाध्याय, प्रसिद्ध लेखिका, इंदौर आज अमर और सुहानी ने एक क़ैफे में मिलने का तय किया था…अमर आज किसी कारण से सुहानी के शहर आया हुआ था.अमर और सुहानी पहली बार मिलने वाले थे…..अमर ने सुहानी से कई बार मिलने की रिक्वेस्ट की थी. शायद वैसे ही कह दिया करता था, क्योंकि वो भी…
मोहब्बत अजीब है…जिन्हें हमारी कद्र नहीं, हम वहीं अपनी रूह रख आते हैं।हम उनके लिए हर लम्हा ख़यालों में सुलगते रहते हैं,और वो हमारी बे-ख़ुदी की ख़बर तक नहीं लेते। शिकायत भी नहीं कर सकते…क्योंकि इश्क़ में इख़्तियार हमारा होता ही कहाँ है।