असली दीवाली: दिखावे नहीं, परिवार की खुशहाली में

डाॅ उर्मिला सिन्हा प्रसिद्ध साहित्यकार, रांची (झारखंड) दीवाली का त्यौहार आ पहुंचा।गौरी साफ-सफाई, रंग-रोगन, पूजा की तैयारी… बेटे की प्रतियोगी परीक्षा, बिटिया का फाइनल एग्जाम… बूढ़े सास-ससुर की देखभाल… पति के नखरे अलग… क्या करे, क्या छोड़ दे।सीमित आमदनी, खर्चे हजार… नाते-रिश्तेदारों का स्वागत-सत्कार। एक आम मध्यमवर्गीय, संवेदनशील परिवार की यही कहानी।खैर, काम निबटते गए……

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खामोश रात…

यादों के दरिए पर जब किसी खास की यादों की आहट आती है, तो रात खामोश होकर भी गहराई से बोलती है। “खामोश_रात” में मन की बेचैनी, अंतहीन यात्रा और इंतजार की भावनाएँ बुनकर एक शांत, संवेदनशील दृश्य रचा गया है, जहाँ रात की चुप्पी भी अपने आप में एक कहानी कहती है।

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वो पल…

सपना चन्द्रा , कहलगांव, भागलपुर (बिहार) कुछ तो था उस पल में —चाँद, कबूतर, सफेद बादल,लालिमा ओढ़े उगता सूरज,और टिप-टिप बरसतीबूँदों की रिमझिम बरसात,इंद्रधनुष की सतरंगी पट्टी। जाने कब इन आँखों में कैद हुईचलती-फिरती हरेक तस्वीर,चाहा उतार लूँ कागज परएक सुंदर सी तस्वीर,उस छोर को याद करते हुएजिससे मैं बंधी थी,मगर उलझी हुई सी। पर…

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मोती जैसे महुआ

भोर की नर्म रोशनी में पेड़ों से टपकते महुआ के फूल, मानो धरती पर बिखरते मोती हों — यही है इस कविता का मूल दृश्य। “मोती जैसे महुआ” में बाल-सुलभ जिज्ञासा और प्रकृति की सादगी का संगम है। दादी की डलिया, महुआ की सोंधी ख़ुशबू और उस क्षण की नीरवता — सब मिलकर एक ऐसे ग्रामीण सौंदर्य को रचते हैं, जहाँ हर फूल जीवन की मिठास और श्रम की सुगंध से भरा है।

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विजया निमला: ज़िंदगी की हर दौड़ में विजेता

57 वर्षीय विजया निमला के लिए रनिंग सिर्फ एक खेल नहीं, बल्कि ज़िंदगी का रूपक है। स्लिप डिस्क, फ्रैक्चर और ऑस्टियोआर्थराइटिस जैसी शारीरिक चुनौतियों को उन्होंने कभी अपनी मंज़िल के बीच नहीं आने दिया। फैशन डिज़ाइनिंग, पारिवारिक ज़िम्मेदारियाँ, समाजसेवा और फिटनेस — इन सभी को सहजता से संतुलित करते हुए उन्होंने यह साबित किया है कि उम्र सिर्फ एक संख्या है। अपने पति राजेंद्र निमला और फिटनेस-प्रेमी बच्चों के साथ उन्होंने जीवन की हर दौड़ में जीत हासिल की है और हर फिनिश लाइन को एक नई शुरुआत में बदल दिया है।

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दिलरुबा और दिल

बिट्ट जैन सना, प्रसिद्ध कवयित्री, मुंबई काम आई न दिल्लगी दिल की।ये कभी क्या हुई किसी दिल की। इश्क़ वालों के साथ ही अक्सर।ज़ेह्न से दुश्मनी हुई दिल की। आशिक़ी में है सिर्फ़ आह-ओ-फ़ुग़ाँ,कब हुई किसको आगही दिल की। दिल हमेशा जवान रहता है,उम्र बढ़ती नहीं कभी दिल की। आज उस दिलरुबा को देखा तो,ख़ुद-ब-ख़ुद…

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अकेले हैं, तो क्या ग़म है…

अकेलापन अंत नहीं, एक नया आरंभ है। यह वह समय है जब आप खुद को, अपनी रुचियों को और अपने जीवन के अनुभवों को नए सिरे से जी सकते हैं।अकेले होने का अर्थ यह नहीं कि आप असहाय हैं, बल्कि इसका अर्थ है कि अब आपके पास स्वयं को समझने और जीवन को अपने तरीके से जीने का अवसर है।

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नव अंकुर की आस

नवपल्लवित पौधा अपनी कोमल जड़ों से धरती का आशीर्वाद लेकर जीवन की नई शुरुआत करता है। वह नव अंबर और नव भोर के साक्षी के रूप में जन्म लेता है, अपने भीतर जीवन की नयी आस संजोए हुए। चारों ओर फैले उपवन की मधुर सुवास उसे उल्लास से भर देती है। वह अभी शिशु है, पर हर दिन वायु और जल का स्पर्श पाकर बढ़ने की आकांक्षा रखता है।

वह जानता है कि एक दिन वह विशाल वृक्ष बनेगा—जिसकी छाया में संसार विश्राम करेगा, जो अनगिनत जीवों को ऑक्सीजन और जीवनदान देगा। उसका अस्तित्व निःस्वार्थ है, उसका हर अंश किसी न किसी के काम आने वाला है

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प्रश्नचिह्न

कभी-कभी निस्वार्थ प्रेम पर भी प्रश्नचिह्न लगते हैं। आँखों में चमक तो होती है—कभी हीरे की, कभी तारे की—पर दोनों की चमक में अंतर होता है, दिखावे का। दोनों दृष्टिगत होते हुए भी दृष्टि की गहराई में फर्क ममता का होता है। तारा ऊँचाई पर है, हीरा गहराई में; दोनों ही दुर्लभ हैं, पर दिल की दूरी उन्हें अलग करती है। किसी को विरासत में सूर्य की रोशनी और चाँद का आशीर्वाद मिलता है, तो कोई अंधेरी अमावस के कुओं से अंधेरा पीता है। सच्ची परख गुमनाम परतों में छिपी होती है, कवि की कल्पनाओं में नहीं—उसे पहचानने के लिए लंबे हाथ नहीं, गहराई चाहिए। शायद इसी कारण, कभी-कभी ममता पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है।

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अस्थाई मजदूर

शहरों में काम करने वाले हम, जिन्हें “अस्थाई मजदूर” कहा जाता है, उनके परिवारों की कहानी अक्सर अनसुनी रह जाती है। उनकी पत्नियां अपने गांव में खेतों में मेहनत करके सब्ज़ियां उगाती हैं और उन्हें बेचकर अपने परिवार का गुजारा करती हैं। उनकी सरलता, उनकी मेहनत, उनका प्राकृतिक सौंदर्य—यह सब कभी-कभी चर्चा का विषय बनता है।

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