father teaching math to child with broken pens and nervous expressions, funny childhood memory scene

पिता और पढ़ाई

पिता और पढ़ाई का रिश्ता जीवन भर का एक अद्वितीय अनुभव है, जिसमें कभी प्रेम, कभी भय, और कभी हँसी का मिश्रण होता है। एक गणित अध्यापक पिता का अपने बच्चों को पढ़ाने का अंदाज़, उनके पेन खोजने की आदतें, और ‘लाभ-हानि’ के दो थप्पड़ों की यादें, यह सब मिलकर एक घरेलू, आत्मीय और हास्य-व्यंग्य से भरी स्मृति बन जाते हैं। यह संस्मरण न सिर्फ एक पिता की जटिलताओं को दिखाता है, बल्कि उनके भीतर छिपे प्रेम, अनुशासन और अनोखी सोच को भी उजागर करता है

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मेरे पापा – मेरी ताक़त”

“जब दुनिया ने मुँह मोड़ा, राहें सब सूनी थीं,
पापा के आँगन में उम्मीदें बस जीती थीं।
हर हार में उन्होंने मुझे मुस्कराना सिखाया,
हर गिरने पर खुद उठकर चलना सिखाया।
पापा — आप मेरे भगवान हैं इस ज़मीं पर,
आपके बिना ये जीवन अधूरा सा है हर पल।”

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खेत में मेहनत करती माँ और उसके साथ खड़ा बच्चा, जो गरीबी और शिक्षा के संघर्ष को दर्शाता है

ये कैसा सवाल

गरीबी और मजबूरी के बीच पला-बढ़ा एक छोटा सा बच्चा, जब जीवन की सच्चाई को करीब से देखता है, तो उसके भीतर एक बड़ा बदलाव जन्म लेता है। यह कहानी आठ वर्षीय भानु और उसकी मजदूर माँ रमिया की है, जो रोज़मर्रा की कठिनाइयों के बीच भी अपने बेटे के बेहतर भविष्य का सपना देखती है।

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डिब्बे वाले

“सब की भूख का हिसाब रखने वाले, अपनी भूख को कैसे दबा कर रख पाते होंगे?”
यह पंक्ति डिब्बे वालों के जीवन की मार्मिक विडंबना को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ दर्शाती है — वे जो दूसरों की भूख मिटाते थे, स्वयं भूखे रह गए।

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जो दिखता है, वह पूरा नहीं स्त्री जीवन के अनकहे अध्याय

शीशमहल” हो या “अंतिम प्रश्न”, कविता वर्मा की कहानियाँ उस स्त्री की कथा कहती हैं जो ना केवल अपनी भूमिका से बंधी है, बल्कि अपनी पहचान के लिए छटपटाती भी है। ये कहानियाँ घर के भीतर की उन संकरी गलीयों की पड़ताल करती हैं, जहाँ स्त्री होना एक उत्तरदायित्व नहीं, एक दंड जैसा महसूस होता है। लेखिका का दृष्टिकोण कहीं भी रोमैंटिक नहीं होता, बल्कि बेहद यथार्थपरक और भीतर तक धँसता हुआ है। स्त्री को सहानुभूति नहीं, समझ की ज़रूरत है — यही संदेश इन कहानियों की अंतर्धारा है।”

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बेचन मामा

मुन्नी शायद पाँच साल की थी जब पहली बार उसे मामा के घर भेजा गया। बचपन से ही माता-पिता से दूर रहकर उसने बड़े लोगों के साए में अपना जीवन काटा — कभी बड़ी अम्मा के यहाँ, तो कभी बुआ के पास। पर मुन्नी के जीवन में सबसे कोमल, सबसे निर्मल प्रेम अगर किसी ने उसे दिया तो वो थे बेचन मामा। बेचन मामा के घर में मुन्नी ने पहली बार वो स्नेह पाया जो शायद एक बच्चा माँ-बाप से चाहता है। उनके साथ वह खेलती, रूठती, मनाती और उनके साये में हर डर भूल जाती।

बेचन मामा के बनाए कंडों की कलमों से लिखते हुए उसकी पटरी सबसे चमकती थी, और मामा की सिखाई हुई सुंदर लिखावट में उसका नाम लिखा जाता था। समय के साथ मुन्नी ने जाना कि बचपन में जो छाया उसे मिली, वह सामान्य नहीं थी — वह तो प्रेम की पराकाष्ठा थी, जो हर किसी के हिस्से में कहाँ आती है।

पन्द्रह साल बाद जब वह फिर मामा के घर लौटी, तो उसकी आँखें नम थीं, लेकिन दिल भरा हुआ — मामा की वही मुस्कान, वही स्नेह और वही अपनापन देखकर। उसने मन ही मन ईश्वर से प्रार्थना की — “हे ईश्वर, हर बच्ची को एक बेचन मामा जरूर मिले

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छोटी कहानियों में बड़े अर्थ

रश्मि चौधरी का लघुकथा संग्रह ‘संवेदनाओं का स्पर्श’ समकालीन हिंदी लघुकथा को एक नई चेतस दिशा प्रदान करता है। ये लघुकथाएं केवल आक्रोश, टकराव या विरोध का आख्यान नहीं हैं, बल्कि इनमें मानवीय सहकार, संवेदनात्मक विस्तार और यथार्थ का सधा हुआ समन्वय देखने को मिलता है। संग्रह की रचनाएं जीवन के छोटे-छोटे प्रसंगों को बड़ी आत्मीयता और वैचारिकता के साथ प्रस्तुत करती हैं। कभी मनोविज्ञान की परतें खुलती हैं, तो कभी समाजशास्त्रीय संदर्भों का मूक आकलन होता है। ‘दुकानदारी’, ‘अन डू’, ‘सम्मान’, ‘मान्यताएं’ जैसी लघुकथाएं अपनी गहनता और प्रतीकों के माध्यम से पाठक के मन को छू जाती हैं। लेखिका की भाषा-संरचना और कथ्य विन्यास लघुकथा को संवेदना की ऐसी धरती पर स्थापित करते हैं, जहाँ विचार और अनुभूति दोनों का संतुलन है।”

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पोहे : स्वाद, परंपरा और देसी दिलों का मिलन

पोहे तो पोहे हैं — एक ऐसा देसी नाश्ता जो न केवल पेट भरता है, बल्कि दिल भी जीत लेता है। खासकर जब बात हो मराठी कांदा-बटाटे पोहे की, तो फिर स्वाद की बात ही कुछ और होती है। राई, कड़ी पत्ता, प्याज, मूंगफली, नींबू और ऊपर से नारियल की सजावट — हर कौर में बस आनंद ही आनंद। चाहे दडपे पोहे हों या मिसळ पोहे, एक्सपेरिमेंट भले होते रहें, पर असली प्रेम तो उसी ऑथेंटिक स्वाद से है। मराठी शादियों में भी पोहे-चाय की रस्म दिलों को जोड़ने का माध्यम बनती है। आज का दिन कुछ देसी हो जाए

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जीवन एक- वचन नहीं है

जीवन एक-वचन नहीं है। यह दो पत्थरों के रगड़ से जन्मी आग की तरह है—जहाँ दोनों का अस्तित्व एक-दूसरे को प्रकाशित करता है। यह टकराहट नहीं, रचना है। हम सबके अनुभव अलग हैं, फिर भी जुड़ाव की ज़रूरत अपरिहार्य है। पर आज, हम सिर्फ़ व्यूज में हैं, अंतर्बोध में नहीं। जो घटित हो रहा है, वह केवल घटना नहीं, संवेदना है—लेकिन हम ठहरते नहीं, स्क्रॉल करते जाते हैं।

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सुबह की रोशनी में दीवार के कोने में जाल बुनती मकड़ी, पास में खिड़की से आती हल्की धूप

उम्मीद के जाल में उलझी मैं

“हां……
यही तो करती हूँ मैं भी हर दिन ….
हर सुबह मैं भी तो ढेरों उम्मीद,
कुछ ख्वाबों-ख्वाहिशों का लेकर
ताना-बाना,
बुनने लगती हूँ अनवरत
एक जाल भीतर अपने l”

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