उम्मीद के जाल में उलझी मैं

सुबह की रोशनी में दीवार के कोने में जाल बुनती मकड़ी, पास में खिड़की से आती हल्की धूप
rashmi ritika

रितिका रश्मि, प्रसिद्ध लेखिका कर्नाटक


अल्लह सुबह…
आधी जागी आधी सोई
उनींदी-सी आंखों के कोर से,
मैंने देखा जाल बुनने में तल्लीन
एक नन्हीं सी मकड़ी को
सहसा याद आ गया मुझे,
कल ही तो हटाए थे मैंने..
जालों की एक मोटी चादर
इस कोने से
उफ्फ्फ…..
इसने तो फिर से बुन डाले
दुगनी मोटी और सघन सी
दूसरी जाल इतनी जल्दी….
कितनी संलग्न और
एकनिष्ट होकर जुटी है ये
कल से हीं निरंतर
लगी रही होगी अकेली शायद..
आया एक खयाल बरबस ही
ज़ेहन में मेरे
पर ये क्या..?
सहसा उस मकड़ी में ,
दिखने लगा क्यों ,
खुद मेरा हीं अक्स मुझे
हां……
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यही तो करती हूँ मैं भी हर दिन ….
हर सुबह मैं भी तो ढेरों उम्मीद
कुछ ख्वाबों-ख्वाहिशों का लेकर
ताना बाना,
बुनने लगती हूँ अनवरत
एक जाल भीतर अपने
कितना मशक्कत करतीहूँ मैं भी
जिस्म और जान का बोझा लेकर
चलने में एक साथ
ठीक इसी नन्हीं मकड़ी के मानिंद
खुद के बुने जाल में
खुद ही तो उलझती रहती हूँ मैं भी सदा
ओहो….
देखो तो सही जरा !
कितनी सुंदर सी जाल बुन डाला
नन्हीं सी मकड़ीने तनिकदेर मेंहीं
शायद अपनी खुशी का कर रही है
इज़हार वो स्वनिर्मित जाल के
उन महीन धागे में इधर-उधर घूम कर
ठीक वैसे ही तो….
जैसे मैं सुबह से दोपहर और फिर
शाम होने तक अपने मन को निर्बाध गति पकराए,
शरीर को रख परे,
कल्पना की ऊंची डगर पर
द्वंद्व फंद, मौन, शोर,एवं?
हास्य-रुदन के समवेत जाल में उलझती मचलती सी,थोड़ी आश्वस्त
महज़ संतुष्ट सी विचरण करती हूँ
अपने आप ही
आह.. ये क्या?
किसी ने एक ही झटके में
मकड़ी के लगन को,
सारे दिन की गई उसकी मेहनत को,
सींक के एक पतले से नुकीले छोड़ में समेट लिया तत्काल हीं
बिचारी मकड़ी मायूस छटपटाती
पड़ी है जमीन पर
अभी अभी तो काफी ऊंचाई पर
अपनी बुनी कलाकृति पर,
इठलाना शुरू हीं की थी वो…
फिर क्यों उसके आशियाने को
पल में नोच डाला गया!
छत के एक कोने में ही तो
पड़ी थी ना वो…..
अरे…..ये क्या!!
तत्क्षण उस मकड़ी में स्वयं से
पुनः साक्षात्कार होने लगा मुझे
हां…बिलकुल ऐसे ही तो मैं
बरबस निकाली जाती हूँ
मेरे काल्पनिक दुनिया की जाल से
अक्सर ही
दिन भर के मेरे सपने
ऐसे ही तो बिखरते हैं…
यूं ही तो जमीन पर
ढूंढा करती हूं मै भी
अपने सारे अरमानों को
अरे वाह….
मकड़ी तो फिर से छत के
उसी कोने में पहुँच चुकी है
वही पुराने जोश-ओ-खरोश के साथ.
अच्छा है….
कल सुबह वो फिर से
जाल बुनते दिखेगी मुझे
ओह….
मैं भी आंखों को मींचते ही सजाने लगी एक नया खूबसूरत सा ख़्वाब
और ़िफर…..़िफर क्या?
अल्लह सुबह फिर मकड़ी
बुनेगी एक नया जाल
मकड़ी की तन्मयता,मेरी बेकरारी
और मेरी व्यग्रता चलेगी साथ साथ
पूरे भी तो करने हैं धज्जियों में बिखरीं तमन्नाओं के जाल हम दोनों को ही
पर ये क्या?
सहसा मेरी आंखों में दो बून्द पानी
और बलात्‌‍? आई है अधरों के कोर पर बहुत क्षीण सी
एक स्मित रेख…
क्योंकि…
वो नादान मकड़ी है अनजान
अंजाम के कल से…
पर जान गई हूं मैं अब कि,
कल शाम दुहराई जानी हैं पुनः
रीत वही पुरानी….
रह जाएगी वो मकड़ी जाल विहीन …..
और तड़पती बिलखती मैं
कांधे पे अपने टूटे बिखरे
अरमानों का पुलिंदा लिए
सदा की तरह….

7 thoughts on “उम्मीद के जाल में उलझी मैं

  1. Waahh waahhh kya khubsurat nazm hui, behtareen isiltiare istemaal kiye aapne, ek alheda tarike se ek manzar banaya, badhai 🥰💐

  2. बेहद मार्मिक और ऊर्जा से लबालब कविता। आपको साधुवाद प्रिय ऋतिका जी। 💗🌸

  3. Very beautiful poem. It represents the reality of women in a man dominating society. Krantikari.. bahut krantikari ❤❤

  4. अत्यंत भावप्रवण रचना जिसमें मकड़ी की रचनात्मकता को मध्य में रखकर एक स्त्री के मनोभाव, उसकी रचनाशीलता, उसके संघर्ष और एकनिष्ठ सर्जना को बड़ी खूबसूरती से चित्रित किया गया है।

  5. बेहद यथार्थ परक और जिजीविषा पूर्ण। जीवन की निरंतरता, उसका प्रवाह और उसकी रचनाशीलता कभी थकती नहीं। अपनी दिनचर्या को तपश्चर्या बनाकर सतत अपने सपनों को बुनती उसके लिए प्रयत्न करती भावनात्मक कविता। कवयित्री को ढेर सारी बधाइयां।

  6. बहुत सुंदर विचार है जी आपके आपको बहुत बहुत साधुवाद

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