
निरुपमा सिंह, वरिष्ठ साहित्यकार,जनपद बिजनौर (उत्तरप्रदेश)
आठ वर्षीय भानु अपनी मज़दूर माँ से बोला,
“माँ, आज भी मुझे फ़सल काटने साथ में जाना होगा क्या?”
“और क्या? काम नहीं करेंगे तो खाएँगे क्या?”
भानु ने चिरौरी की
“पर माँ, मुझे तो आज स्कूल जाना है। नहीं गया तो कल क्लास में सज़ा मिलेगी।”
माँ ने जानबूझकर पूछा,
“मास्टर जी क्या पढ़ाएँगे? ख़ुद तो मोबाइल में घुसे रहते हैं।”
“वे लिखने को दे देते हैं। नहीं लिखा तो खड़े रहो वाली सज़ा दे देते हैं,” भानु बोला।
“देख बेटा! मैं चाहती हूँ कि तू पढ़-लिखकर कुछ बन जाए, ताकि ये काम कभी न करना पड़े। मजबूरी में साथ इसलिए ले जाती हूँ कि एक से भले दो हो जाते हैं,” कहकर माँ चुप हो गई। इससे ज़्यादा वह बच्चे को समझा भी नहीं सकती थी।
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साँझ तक गेहूँ की फ़सल काटने के बाद रमिया मुट्ठी-मुट्ठी भर डालियों की अलग-अलग पूलियाँ बाँधकर रखती रही। खेत के मालिक ने आकर हर बीस पूलियों (गड्डियों) पर उन्नीस अपनी और एक कटाईदार की अलग कर दी।
इस हिसाब से दिन भर की कड़ी मेहनत के बाद भी कुल चार पूलियाँ रमिया को मिलीं। यह देखकर भानु मन ही मन तिलमिला उठा। वह सोच रहा था कि दिन भर उसकी माँ ने धूप में कितनी मेहनत से गेहूँ काटा है और बदले में इतना कम अनाज मिला है। जबकि उसने भी माँ का हाथ बँटाया, पर उसका हिसाब कहीं नहीं।
उसे चिंतित देख माँ सोच रही थी वह मायके में पढ़-लिख नहीं पाई, कि तभी ब्याह हो गया। फिर पति का कम उम्र में ही देहांत हो गया। परिवार वालों ने मुँह फेर लिया, तो बच्चों की रोटी के लिए घर से बाहर निकलना ही पड़ा।
वापसी के रास्ते में भानु ने माँ से कहा—
“माँ, अब से मैं पूरी मेहनत से पढ़ाई करूँगा। मुझे पढ़-लिखकर नौकरी करनी है, खेत खरीदने हैं, जिससे तुम्हें किसी और की मज़दूरी न करनी पड़े।”
माँ समझ गई थी कि आज भानु को पढ़ाई का महत्व अच्छे से समझ आ गया है। वह भी यही चाहती थी।
रमिया ने भी मन ही मन फैसला कर लिया कि कल से वह अकेले ही खेतों में मेहनत-मज़दूरी करने जाया करेगी।
