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जहाँ रातें सिसकती हैं

जब पेट की आग के आगे लोरी भी बेबस हो जाती है।

भूख, गरीबी और माँ के संघर्ष की मार्मिक कविता

मधु मिश्रा, प्रसिद्ध लेखिका, कोमना नुआपड़ा, उड़ीसा

टूटी फूटी झोपड़ी में,
गहरी रातों का मौन भी,
छटपटाता है गहरी नींद के लिए,

पानी की घूंट से भला..
पेट भरता है कहीं..?
भूख से बिलखता बच्चा तो
अड़ता है एक-एक निवाले के लिए !

भूखे पेट में नहीं अच्छी लगती ,
बच्चे को लोरी न कोई दुलार!
भूखे पेट तो चंदा मामा भी,
सिरहाने आते नहीं सुलाने के लिए..!

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ऐसा नहीं है कि माँ नहीं करती,
परिवार के लिए रोज़ी रोटी का जुगाड़..!
कमरतोड़ मेहनत करती है माँ,
रोज़ चूल्हा जलाने के लिए..!

कसमसा कर रह जाती माँ,
जब दिन भर के मेहनताने को,
छीन लेता है उसका पति,
अंधाधुंध शराब पीने के लिए..!

2 thoughts on “जहाँ रातें सिसकती हैं

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