श्रृंगार

एक पारंपरिक भारतीय आंगन में सफेद वस्त्रों में सजी एक स्त्री का अंतिम श्रृंगार, पास खड़ा शोकाकुल पति, धुंधली रोशनी और गंभीर वातावरण।

डॉ. रत्ना मानिक, प्रसिद्ध लेखिका, जमशेदपुर

सब कहते थे-” साक्षात पार्वती है पार्वती! रुद्रा की पार्वती।” कैसे रुद्रा की आंखों में नेह की हल्की सी लालिमा देखने के लिए,उसके सूखे अधरों से अपना नाम सुनने के लिए दिन-रात साए की तरह वह रुद्रा के इर्द-गिर्द डोलती रहती थी।
उसके काम से लौटते ही बैठका के बगल वाले अहाते की खाट पर गमछा,चापाकल से बाल्टी भर पानी और लोटा रखकर किवाड़ की ओट से उसके कदमों की चाप सुनने को सांस रोके खड़ी हो जाती थी वह । रुद्रा के पैरों की आवाज के साथ एक मर्दाना खुशबू का तेज झोंका दबे पांव उसके नथुनों में प्रवेश कर जाता और उसकी सांसें ऐसे बेकाबू हो जाती जैसे फूलों के मादक रस-गंध से तितलियां बावली हो जाती हैं।

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रुद्रा की नज़रें पूरे अहाते का मुआयना कर किवाड़ की ओट में खड़ी काया पर पल भर के लिए ठहरती ज़रूर थीं ,हृदय में हल्की कंपन भी होती थी…आंखों में कामना का धीमा ज्वार भी उफान लेता लेकिन किसी निर्मोही की भांति वह हाथ मुंह धो कर गमछे से मुंह पोंछ वापस बैठके में अपना आसन जमा लेता। गमछे को अपने चेहरे पर फिराते हुए कई बार उसे अपने होठों के करीब ले आता किसी के हाथों की गंध उसे मदहोश करती लेकिन अचानक किसी की बिल्लौरी आँखें और होठों से खेलती तिलिस्म भरी मुस्कान उसकी आंखों में नफरत भर देती ।
कसैली चीज़ें खाकर जैसे ज़बान का स्वाद बिगड़ जाता है बिल्कुल वैसे ही उस स्याह अतीत को याद कर रुद्रा के भोले से मुख पर वज्र सी कठोरता उभर आती,लंबे-चौड़े ,सुगठित शरीर की तमाम नसों में अजीब सा खिंचाव होने लगता और चेहरे पर कभी कभार खिलने वाली मुस्कान की धवल चांदनी क्षण भर में आवारा बादलों की खोह में समा जातींं ।
वो…वो…उसे कहां भूल पाया था जिसे ख़ुद से ज्यादा चाहा था…आंख मूंद कर जिस पर भरोसा किया था…जिसकी एक मुस्कान उसकी कचहरी की दिन-भर की थकान को पलक झपकते ही चुटकियों में गायब कर देती थी। उन यादों की सांसें तो उसकी सांसों में रची बसी थीं।
कचहरी के काम से शहर आते-जाते जाने कब, कैसे उसकी बिल्लौरी आंखों पर सब कुछ हार कर वह अपने छोटे से परिवार का ताना-बाना बुनने लगा था।
लेकिन शादी का ज़िक्र सुनते ही वह एकदम से उछल पड़ी थी जैसे उसके पैरों के नीचे जलते अंगारे रख दिए गए हों।”अरे यार! ये शादी वादी का झमेला…no dear it’s too early,I still have a lot to do, and you’re in such a hurry to get married. Come on, just enjoy life!” कहते हुए उसने बेहद लापरवाही और फूहड़ तरीके से अपनी दाहिनी आंख दबा दी थी।
वो रुद्रा की चाहत को, उसके सपनों को ठेंगा दिखा कर किसी जादूगर के जादू की तरह एकदम से गायब हो गई। वो क्या गई कि रुद्रा के चेहरे की मुस्कान ने उससे नाता तोड़ दिया। वो तो अपने दिल के टूटने का ग़म भी न मना सका,पुरुष था न! आंखों के आसमान में विरह के घनघोर बादल छाते ज़रूर थे पर बरस कर मन की उद्विग्न भूमि को शीतल करने की
इजाज़त न थी। रुद्रा की उदासी पहाड़ जैसी विशाल और कठोर होती चली गई।
रुद्रा के विवाह न करने की ज़िद से उसकी अम्मा दिन-रात बौखलाई रहतीं। जवान बेटे की चिंता में कभी नदी सी खामोश हो जातीं और कभी क्रोध में समुद्र सी प्रचंड ।
अम्मा ने जब बेटे के ग़म में खटिया पकड़ लिया तो पहले से आए रिश्तों में से एक का चुनाव कर रुद्रा ने विवाह के लिए बेमन से “हां” कर दिया।
गिरिजा! हां !यही नाम था रुद्रा की पत्नी का।मालती बेल सी कोमल काया,ऊंची पतली नाक,उन्नत माथे पर लटकती घुंघराले बालों की बलखाती लटें और घूंघट के भीतर से झांकती दो चमकीली, कजरारी, सतर्क आँखें।
गिरिजा ने ससुराल में पांव रखते ही गृहस्थी ऐसे सम्भाल लिया जैसे उस घर से उसका वर्षों का नाता हो।रुद्रा की अम्मा उसकी बलैया लेते न थकतीं। उसका मुख चूम कर ढेरों आसीस दे डालतीं उसे।
रुद्रा कभी उसकी ओर बढ़ने की कोशिश भी करता तो बिल्लौरी आंखों का उपहास उसके कोमल मन पर पड़े छल के घाव को खरोंच डालता और हृदय अविश्वास से कराह उठता।
गिरिजा अपनी गृहस्थी और रुद्रा को जिस समर्पण से संभालती कि देखने वाले दंग रह जाते।
रुद्रा के व्यवहार के लिए उसके होठों पर न शिकायत रहती न चेहरे पर घर और अम्मा को संभालने की खींझ…पर सूरजमुखी की तरह खिले रहने वाला उसका मुख धीरे-धीरे कुंभलाने लगा था… शरीर छीझने लगा था और चेहरा पीला पड़ने लगा था।
एक दिन अचानक दालान के चापाकल के पास वो मूर्छा खाकर गिर पड़ी। संजोग था कि रुद्रा कचहरी से आ चुका था।घर में कोहराम मच गया ।आनन-फानन में उसे शहर के अस्पताल लाया गया ।
“क्या!” डॉक्टरों ने जो खुलासा किया उसे सुनकर सभी चौंक पड़े।
मां तुम तो उसके साथ दिन-रात रहती थी फिर ये सब कैसे …रुद्रा ने मां के चेहरे पर सवालिया आँखें जमा दी थीं लेकिन अम्मा तो ख़ुद को कोसे जा रही थीं… उनका दुलार किस काम का कि वे देख न सकीं कि गिरिजा रुद्रा के स्नेह कुंड में ख़ुद को होम किए दे रही है।
गिरिजा की अंतड़ियां भूख सहते रहने से सूख गई थीं । एक दिन…दो दिन…तीन दिन… डॉक्टर डटे रहे लेकिन गिरिजा की आँखें न खुलीं।
आज उसके पीले चेहरे और सूखी काया का सोलह श्रृंगार किया जा रहा था ।सास घड़ी-घड़ी अचेत हो रहीं थीं और रुद्रा…रुद्रा तो सती के वियोगी शिव की भांति अपने अविश्वास की लाश कांधे पर उठाए गिरिजा की…अपनी पत्नी की मांग को अंतिम बार भर रहा था। आज आंखों के आसमान में चिर विदा की असहनीय पीड़ा थी…मन में अंगार था किसी के छल से उपजा अंगार… उसकी आंखों ने मिथ्या पुरुषत्व की बेड़ियों को तोड़ दिया था…चिर वियोग की पावन बूंदें रुद्रा की आंखों के बांध तोड़कर गिरिजा के माथे पर जा गिरी थीं।गिरिजा का अंतिम श्रृंगार पूर्ण हो चुका था।

One thought on “श्रृंगार

  1. पूरी रात जागता रहा
    सपने सजाता,
    तुम आती थीं, जाती थीं
    फिर आतीं फिर जातीं ,
    परन्तु
    यादें करवट लिए सो रही थीं

    सुबह,
    यादों ने ही मुझे झझकोरा
    और जगाया,
    जब मै जागा
    यादें दूर खड़ी हो
    घूर-घूर कर मुझे देखती
    और मुस्कुरा रहीं थीं

    मैंने कहा
    चलो हटो ,
    आज नई सुबह है
    मै नई यादों के साथ रहूँगा

    वे नज़दीक आईं
    और ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगीं

    लाख जतन किए
    वे गईं नहीं

    यादें जाती नहीं
    पूरे घर पर
    कब्ज़ा कर बैठी ह

    यादें जो एक बार जुड़ जाती हैं
    वे जाती नहीं
    बस करवट लेकर
    सो जाती हैं।

    कुँअर रवीन्द्र

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