इतनी-सी खुशी!

गली में हाथ-ठेला लगाए कलई वाला, भट्टी के पास रखे पीतल के बर्तन और आसपास खड़े उत्सुक बच्चे

वर्षा गर्ग, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई

“कलई करा लो…!”
जैसे ही यह आवाज़ गूँजती, घर में तूफ़ान-सा आ जाता।

मोरी, यानी जहाँ बर्तन माँजे जाते थे, वहाँ से कुछ बर्तन उठाकर जल्दी-जल्दी धोए जाते। सब्ज़ी की कढ़ाही खाली की जाती, अन्य बर्तन जमा किए जाते। कुछ बर्तन ऊपर बनी टांड़ से उतारे जाते और फिर पैसों के मोलभाव के उपरांत कलई करने वाले को गिनकर बर्तन सौंप दिए जाते।

यहीं से शुरू होता हम बच्चों का खेल। हमारे घर के सामने अधिक खुली जगह होने से वह ठीक घर के सामने अपना हाथ-ठेला खड़ा कर देता।

फिर निकलता उसका सामान बोरी में भरे हुए कोयले, बोतलों में भरा नौसादर और बहुत सँभालकर रखे हुए धातु के टुकड़े, जिनके बारे में बड़े होने पर पता चला कि वह राँगा धातु, यानी टीन, होती थी।

घर से दो बाल्टियाँ पानी मँगाया जाता। कौन-सी बाल्टी दी जाएगी, इस पर भी माँ और दादी की बहस होती। एक बाल्टी वह अपने तसले में उलट लेता और दूसरी ज़मीन पर।

वहीं गड्ढा खोदकर छोटी-सी भट्टी गाड़ता, कोयले डालकर सुलगा देता। हम सभी बच्चे उसे जादूगर समझते हुए आसपास गोल घेरे में खड़े हो जाते।

काले पड़ चुके बर्तनों पर एक तरल पदार्थ डालते ही झाग उठने लगते। यह पदार्थ कास्टिक सोडा था.यह बात हाई स्कूल में केमिस्ट्री पढ़ते हुए समझ आई।

उन दिनों हमारे घर में सबसे ज़्यादा पीतल के बर्तन थे। दादी अम्मा और मम्मी की शादी के ढेरों बर्तन हुआ करते थे. कढ़ाही, कलसा, भगौने, परात और ढेर सारे छोटे-बड़े कटोरे व कटोरियाँ भी।

चमचमाते स्टील का दौर शुरू हो चुका था। मुझे कलई करते देखना अच्छा लगता था, पर थोड़ी शर्मिंदगी भी होती कि जहाँ कॉलोनी के अन्य लोग दो-चार बर्तन लाते थे, हमारे घर से बीस-पच्चीस बर्तन कलई के निकलते थे।

बाहरी चकाचौंध का शायद वही सबसे पहला अनुभव था। आज बाज़ार में बिकते दामी पीतल के बर्तनों को देखकर वे कीमती बर्तन याद आ जाते हैं। आज तक इस बात को समझ नहीं पाई कि हम अपना वर्तमान, भविष्य में भूतकाल बनाकर ही क्यों याद करते हैं?

बर्तन का मैल छुड़ाकर उस पर गर्म कर राँगा डाला जाता और तुरंत ही नौसादर छिड़का जाता। कपड़े की छोटी-सी पोटली घुमाते ही पूरा बर्तन चमक उठता। पानी से भरे तसले में बर्तन डूबते ही ‘छन्न’ की आवाज़ के साथ वातावरण एक अद्भुत सुगंध से भर जाता।

काम के बाद कलई करने वाले को ठंडा पानी और एक कप चाय भी पिलाई जाती, जिसकी भरपाई किसी छोटे गिलास या कटोरी पर मुफ्त कलई करवा कर की जाती। तब ‘एक पर एक फ्री’ या अन्य कोई उपहार योजना नहीं होती थीं।

काम खत्म होने पर वह अंगारे बुझाकर कोयले वापस बोरी में भरता, राख को उलट-पलट कर गोल छर्रों में बदल चुके राँगे को भी बटोर लेता। उसी समय हम बच्चे भी कोशिश करते और दो-चार छोटे छर्रे ढूँढ़कर अपने पास माचिस की डिबिया में जमा कर लेते।

बहुत बड़ा खज़ाना होता था यह सब।
किसी महँगे खिलौने से ज़्यादा खुशी यूँ ही मिल जाती थी।

उसके जाने के बाद सारे बर्तन घर में लाकर दोबारा माँजे जाते। इस बार हर चमकते बर्तन की चमक माँ और दादी के चेहरे पर नज़र आती। चमकदार बर्तन सभी को उत्साहित कर देते और जीवन पुनः ढर्रे पर आने से पहले दो-चार दिन नई दिखती कढ़ाही में बनी सब्ज़ी बहुत स्वादिष्ट लगती और नई-सी परात में गूँथे आटे की रोटियाँ भी बहुत मुलायम बनती थीं पता नहीं क्यों!

अपने जीवन-यापन हेतु गली-गली घूमता कलई वाला हम सभी के जीवन में खुशियाँ बिखेर जाता ऐसी सच्ची, पवित्र और मासूम खुशी, जो अब किसी महँगे रिसॉर्ट में स्पा करवाने से भी नहीं मिलती।

यादों की अनमोल धरोहर के रूप में सुरक्षित हैं बचपन के दिन और उनसे जुड़े कितने ही संस्मरण।

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