Live Wire News literary portal with Gulmohar and Rajnigandha flowers
गली में हाथ-ठेला लगाए कलई वाला, भट्टी के पास रखे पीतल के बर्तन और आसपास खड़े उत्सुक बच्चे

इतनी-सी खुशी!

“कलई करा लो…” की पुकार के साथ शुरू होती थी बचपन की हलचल। पीतल के बर्तनों की चमक, भट्टी की आँच और राँगे की खुशबू के बीच छिपी थीं मासूम खुशियाँ। यह संस्मरण केवल कलई की प्रक्रिया का वर्णन नहीं, बल्कि उस दौर की सादगी, पारिवारिक आत्मीयता और छोटी-छोटी बातों में मिलने वाली अपार खुशी की झलक है। आज की चकाचौंध भरी दुनिया में वे दिन याद बनकर मन को भिगो जाते हैं।

Read More