
मंजू शर्मा मनस्विनी, प्रसिद्ध लेखिका
आज शीतलहर ने प्रकृति को पूरी तरह अपने अनुरूप कर दिया था। ऐसे में अदरक वाली कड़क चाय भी लगभग बेअसर थी… बस ठिठुरन बढ़ती जा रही थी। उसी वक्त मन ने अपनी पारी खेली और अतीत में जाकर यादों का अलाव सुलगा दिया। मैं सोचने लगी.बड़े दिनों से उससे बात नहीं हुई। पता नहीं वह कैसा होगा? न जाने क्यों मन ठहर-ठहर कर उसी ओर लौटने लगा।
यादों की हल्की-सी लहर उठी और स्मृतियों ने उन दिनों को समेटना शुरू किया, जब हम कुछ दोस्त सोशल मीडिया पर चल रही एक साहित्य प्रतियोगिता के दौरान मिले थे।
मैंने उससे पूछा, “तुम्हें अनुज बुलाऊँ या दोस्त?”
उसने दोस्ती कबूल की। हँसकर बोला, “रिश्ते निभाने में थोड़ा कच्चा हूँ। दोस्ती निस्वार्थ होती है।”
बस तब से बातें शुरू हुईं। इतनी बातें करता, जैसे कई सालों का सामान मन की दुकान में इकट्ठा कर रखा हो उसने… और मैं उसकी खरीददार बन गई। मैं भी उसके साथ सहज महसूस करती, उसकी सारी बातें मन से सुनती और अपनी भी कुछ कह लेती। इस क्रम में समय का भान ही नहीं रहता। इस सफर में हम चार-पाँच दोस्त साथ ही रहे। वह सबकी जमकर खिंचाई करता और सबको खूब हँसाता।
उन दिनों बड़ा शैतान था, पर हर समय डरता भी रहता कहीं मैं नाराज़ न हो जाऊँ, कहीं हथौड़ा लेकर खड़ी न हो जाऊँ! मेरे आते ही दुम दबाकर भाग जाता। सब सखियाँ कहतीं, “आ गई हिटलर! अब वो नहीं रुकेगा।”
खूब मस्ती होती थी। जब मज़ाक की बारी आती, तो मुझे भी वह कायदे से लपेटता था। खुद की हँसी वह लाइट बंद कमरे में पास बैठी बीबी के सामने जाने कैसे रोकता होगा! हम सब उसके इसी अंदाज़ का खूब आनंद उठाते थे। उसकी हर बात में मुझे अपने बेटे की झलक दिखती थी। कितने खूबसूरत थे वे दिन… कुछ देर दोस्तों के साथ, दूर-दूर शहरों में होकर भी हम सब खुलकर हँस लेते थे।
दो साल बीत गए। समय कब पंख लगाकर उड़ गया, पता ही नहीं चला।
फिर व्यस्तताएँ बीच में आ खड़ी हुईं। उसकी जिम्मेदारियाँ बढ़ीं, कुछ अनकहे तनाव आए। कोविड जैसी अन्य कई बीमारियों ने भी खेल दिखाए। समय को दो पल ठहरने का अवसर नहीं मिला। एक दौर ऐसा आया कि पल भर में सिमट जाने लगीं घंटों की बातें, और फिर धीरे-धीरे कम होती गईं। मैं उसकी परिस्थितियों से वाकिफ थी, इसलिए उससे कभी शिकायत या नाराज़गी जाहिर नहीं की। बस हर दुआ में उसकी सलामती चाही।
वह अपनी दुनिया में व्यस्त हो गया। हाँ, कभी-कभार त्योहारों की शुभकामनाएँ या दुआ-सलाम होती रही।
आज बहुत दिनों बाद यादें हवा के झोंके की तरह लौटीं। मन हुआ, उसका दरवाज़ा खटखटा दूँ। मैंने दरवाज़ा खटखटाया।
और दरवाज़ा खुला भी। उसने बड़े खूबसूरत तरीके से मेरा स्वागत किया आखिर हमारा रिश्ता इतना मजबूत जो था। अंदर वही चिर-परिचित अपनापन। हँसी, हल्की नोक-झोंक, एक-दूसरे की टाँग खींचने की वही पुरानी आदत। जैसे बीच का समय कभी गुज़रा ही न हो।
सब कुछ वैसा ही था… पर कुछ तो बदला था।
पहले वह एक नटखट लड़का था .हर पल जिसका मन खुराफात सोचता था; सबकी खिल्ली उड़ाना, सबको हँसाना, अपनी ओर आकर्षित करना जिसका स्वभाव था। आज उसके भावों में ठहराव था, बातों में संयम और सोच में गहराई थी। मुझे लगा, वह अब पहले जैसा नहीं रहा। परिपक्वता लिए भावों से सोचने लगा है।
आज वह पिता था। उसे पिता के रूप में बदला देख मेरे भीतर आनंद की लहर दौड़ गई। तभी समझ आया. जब बच्चे आते हैं, तो हम सिर्फ माता-पिता नहीं बनते, हम ज़्यादा संवेदनशील मनुष्य बन जाते हैं।
बातों के बीच मैंने कहा, “अब मुझे जाना होगा। ज़्यादा समय नहीं रुक पाऊँगी।”
उसने सहज स्वर में कहा, “ठीक है… पर आप इतनी भावुक मत हुआ करो।”
मैंने मुस्कराकर कहा, “ओ हीरो, आज भावुक मैं नहीं थी, तुम थे।”
वह हँसा, “हाँ, पढ़ लिया आपने आखिर मेरे मन के भावों को… यही तो अपनापन है। आपसे बेहतर मुझे पढ़ भी कौन सकता है? एक माँ की तरह मेरे भावों को समझ लिया आपने।”
यही सच था।
यह रिश्ता दो प्रेमियों का नहीं है। यह स्नेह, विश्वास और ममता का रिश्ता है। मुझे पता है कि वह मुझे दोस्त कहता है, लेकिन सम्मान माँ जैसा देता है; और मैं उसे बेटे की तरह ही समझाती हूँ। कभी डाँटते समय यह सोचा ही नहीं कि इसे मैंने जन्म नहीं दिया। बिन जताए, बिन बताए, कुछ भी कह देता था… और वह बेटा आज खुश है।
एक माँ आखिर और क्या चाहती है?
आज जहाँ वेलेंटाइन डे जैसे पाश्चात्य पर्वों की धूम है, वहाँ कुछ रिश्ते ऐसे भी हैं जो समय और स्थान की सीमाओं से परे होकर मन की धरा पर अंकुरित होते हैं और सदैव हरे-भरे, महकते रहते हैं। वह मेरा दोस्त है या बेटा. क्या ही फर्क पड़ता है?
कुछ रिश्ते नाम नहीं माँगते।
वे बस निभाए जाते हैं बिन बाँधे,
फिर भी सबसे मजबूती से।
दूरियों की परवाह किए बिना…
जहाँ असीम प्रेम है, अपार स्नेह है और अगाध अपनत्व है।