मानस का परिमल

डॉ. कंचन जैन, प्रसिद्ध लेखिका

अंधियारे की कोख से जन्मी, एक किरण वैचारिक हो,
संकीर्णता की बेड़ियाँ काटे, मन ऐसा साहसिक हो।
न केवल अक्षरों को बाँचन ही यहाँ विकास है,
भीतर छिपे उस आत्म-दीप का होता सहज प्रकाश है।

‘कूप-मंडूक’ बने रहें तो, जग छोटा लग जाएगा,
विस्तारित होगा मानस तो, अंबर भी झुक जाएगा।
हृदय-भूमि पर जब बोएँगे, हम सद्भाव के बीज नए,
तभी मिटेंगे द्वेष-द्वंद्व और संशय के सब रोग गए।

‘लोहे के चने चबाने’ जैसा, है संकल्प यहाँ अनिवार्य,
पौरुष के बिन सिद्ध न होते, जग में कोई कठिन कार्य।
‘गागर में सागर’ भर लेना, चिंतन की वह गहराई है,
सत्य की राह पर चलने में ही, असली मान-बड़ाई है।

जहाँ स्वार्थ की दीवारें ढहें, परहित का गान जहाँ हो,
मानवता की ऊँची ध्वजा, वह उन्नत आसमान जहाँ हो।
जड़ता का त्याग करें हम सब, चेतना का संचार करें,
ज्ञान-रश्मि से इस जीवन का, पावन हम श्रृंगार करें।

अपनी ही ‘खिचड़ी पकाने’ से, ऊँचा उठना होगा अब,
‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ हमारा, समझना होगा हमको सब।
विकसित मन ही वह दर्पण है, जिसमें ईश झलकता है,
तपकर ही वैचारिक कुंदन, कुंदन-सा दमकता है।

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