
सुरभि ताम्रकार, लेखिका, दुर्ग
हर स्पर्श को वासना कह देना
कितना आसान है, प्रिय
पर क्या तुमने कभी
वीणा बजाने वाली उँगलियों को देखा है?
जो सिर्फ़ छूकर
रागों में प्रार्थना भर देती हैं।
तबले पर पड़ती हथेली
कोई लालसा नहीं जगाती,
बस ताल रचती है
अनुशासन, अभ्यास और समर्पण की।
बाँसुरी के छिद्रों को
जब उँगलियाँ सहजता से छूती हैं,
तो स्वर जन्म लेता है
न शोर, न हड़बड़ी,
बस एक सहमति भरा शंखनाद।
वैसे ही कुछ स्पर्श
मर्यादा ओढ़े होते हैं
जो तुम्हारे और मेरे
मन की उलझनों को पढ़ लेते हैं,
बिना शब्दों के।
तुम ज़रा महसूस तो करो,
ये स्पर्श
शरीर की नहीं,
मन की ज्ञानेंद्रियाँ हैं।
और फिर तुम स्त्री हो
इसे मुझसे बेहतर जानती हो।
अच्छे और बुरे स्पर्श का अंतर
तुम्हारी त्वचा नहीं,
तुम्हारी आत्मा पहचानती है।
समाज के कायदों से नहीं,
अपने अनुभव से समझो।
आँखों का स्पर्श
व्यक्तित्व को मन में जगह देता है।
हँसी का स्पर्श
अजनबियों को अपना बना लेता है।
पैर छू लेने से
तुम खुद सम्मानित हो जाती हो।
हाथ मिलाने से
दोस्ती मज़बूत होती है।
और गले मिलने से
जब तुम खुद से मिलती हो।
इसलिए, प्रिय,
मर्यादित स्पर्श को
अभागा मत ठहराओ।
क्योंकि हर स्पर्श
गुनाह नहीं होता
कुछ स्पर्श
बस इंसान होना सिखाते हैं।

Meri ek gazal aap sabhi ke liyen
और फिर तुम स्त्री हो…… इसे मुझसे….
बेहतरीन लाईनें। सुरभि जी।