मर्यादा पुरूषोतम
मनुष्य रूप में प्रभु श्रीराम का अवतार मर्यादा, त्याग और संघर्ष का अद्भुत संदेश देता है। प्रस्तुत कविता उसी दिव्य स्वरूप को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।

मनुष्य रूप में प्रभु श्रीराम का अवतार मर्यादा, त्याग और संघर्ष का अद्भुत संदेश देता है। प्रस्तुत कविता उसी दिव्य स्वरूप को भावपूर्ण श्रद्धांजलि है।
प्यार सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि किसी की ख़ामोशी को समझ लेने का नाम है। सोशल मीडिया के इस दौर में रिश्ते जल्दी बन जाते हैं, लेकिन उन्हें खूबसूरत बनाए रखने के लिए प्रेम के साथ मर्यादा, सम्मान और संवेदनशीलता भी ज़रूरी है।
कुछ स्पर्श शरीर को नहीं, मन को छूते हैं। वे न वासना जगाते हैं, न भय बस भीतर कहीं भरोसे की लौ जला देते हैं। मर्यादा में बंधे ऐसे स्पर्श रिश्तों को शब्दों से पहले समझा देते हैं और इंसान को इंसान होने का एहसास कराते हैं।
यह रचना संवाद की इच्छा के माध्यम से जीवन के विभिन्न पहलुओं, मानवीय भावनाओं और सामाजिक विडंबनाओं को उजागर करती है। कवयित्री अपने मन की गहराइयों से उन क्षणों और पात्रों से बात करना चाहती है जो प्रकाश और अंधकार, प्रेम और वियोग, सम्मान और अपमान, मर्यादा और अन्याय, त्याग और पीड़ा के प्रतीक हैं। वह आकाश के अंधकार, स्वाति नक्षत्र की बूंद, सुगंधित पुष्प, शहीद की मां, परंपराओं से पीड़ित नारी, दहेज से आहत पिता, बिछड़े प्रेमी, व्यथित पुरुष, राम की मर्यादा, बुद्ध के धर्म ज्ञान और अश्रु की स्थिर बूंद तक—हर उस संवेदनशील अनुभव से जुड़ना चाहती हैं जो मनुष्य के भीतर गहराई से स्पंदित होता है। यह संवाद आत्मा की पुकार है, जो जानती है कि शब्द शायद परिभाषित न कर पाएं, लेकिन मौन में भी हृदय की पीड़ा सजीव हो उठती है।