
अरुणा रावत अरु, लेखिका, बंगलौर
उसने कहा
“मैं चाहता हूँ, तुम मुझे टूटकर चाहो…”
वह आया
और मुझे तोड़कर चला गया।
मुख़्तसर-सी मुलाक़ात रही उससे,
वह मेरे ज़ख़्मों को
कुरेदकर चला गया।
जाते-जाते बोला-
“तुमने मुझे गले भी नहीं लगाया।”
मेरी गर्म हथेली
अनायास ही
उसके गालों को छू गई
मेरे निस्वार्थ प्रेम का स्पर्श।
उस निर्मल छुअन को
अपने साथ लेकर,
वह दोबारा आने का वादा कर
चला गया।
और फिर
वह न आया…
अब तक।
इंतज़ार
बस उसका रह गया।
