जहाँ शब्द नहीं थे, वहाँ माही थी…

सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज

गाँव के उस आख़िरी सिरे पर, जहाँ पगडंडियाँ खेतों की छाती चीरती हुई आगे बढ़ती थीं और सुबह की हवा में मिट्टी, ओस और पक्षियों की पुकार एक साथ घुल जाती थी..वहीं एक पुराने-से आँगन में माही पली-बढ़ी थी।
संयुक्त परिवार का वह आँगन सिर्फ ईंट-पत्थर नहीं था, वह संस्कारों की छाया था, जहाँ हर सुबह तुलसी के पत्तों पर ओस ठहरती और हर शाम रिश्तों की गरमाहट से दिन ढलता।

माही बचपन से ही कुछ अलग थी। वह शब्दों से ज़्यादा सिसकियों को समझती थी, और इंसानी भाषा से ज़्यादा पशु-पक्षियों की आँखें पढ़ लेती थी। गाँव में जब कहीं कोई घायल कुत्ता कराहता मिलता, किसी बैल के खुर में कांटा धँस जाता, या किसी नन्ही चिड़िया का पंख टूट कर धूल में गिर जाता तो लोग कहते-“माही को बुलाओ…”और माही सचमुच आ जाती।
बिना डर, बिना घृणा, बिना यह सोचे कि लोग क्या कहेंगे।कभी हल्दी और सरसों के तेल से काँपते हाथों से घाव साफ करती,
कभी अपनी पुरानी ओढ़नी फाड़कर पट्टी बाँध देती। उसके स्पर्श में अजीब-सी शांति होती. जैसे दर्द को कोई नाम मिल गया हो।जानवर उसके पास आकर चुप हो जाते, मानो कह रहे हों-“तू समझती है…”

लेकिन करुणा के इस सागर के बीच माही ने अपने सपनों को डूबने नहीं दिया। दिन में घर के काम, कभी छोटी-सी दुकान पर बैठना, कभी परिवार की ज़िम्मेदारियाँ और फिर रात। रात, जो उसके लिए संघर्ष का समय थी…रोशनी में, थकी आँखों से किताबों के पन्ने पलटना, और मन में एक ही सपना-सरकारी नौकरी।

केवल अपनी पहचान के लिए नहीं,बल्कि इसलिए कि वह गाँव के लिए कुछ कर सके,उन आवाज़ों के लिए खड़ी हो सके जो बोल नहीं पातीं- चाहे वे इंसान हों या बेज़ुबान। असफलताएँ भी आईं। परीक्षाएँ हाथ से फिसलती रहीं। कई रातें ऐसी भी थीं जब आँसू किताबों पर गिर पड़े। पर माही ने हार मानना नहीं सीखा था। क्योंकि उसने देखा था-दर्द कैसे सहा जाता है।माही लिखती भी थी।उसकी डायरी कोई साधारण डायरी नहीं थी,वह उन पीड़ाओं की शरणस्थली थी जिन्हें दुनिया सुनना नहीं चाहती।
कभी किसी घायल पशु की खामोश चीखें शब्द बन जातीं,कभी गाँव की औरतों का दबा-दबा दर्द पन्नों पर उतर आता।
लेखन उसके लिए शौक़ नहीं, आत्मा का बोझ हल्का करने का रास्ता था।माही की सबसे बड़ी ताक़त उसकी अतिसंवेदनशीलता थी- जिसे दुनिया अक्सर कमजोरी कहती है।वह किसी का दुख देखकर मुँह नहीं मोड़ सकती थी।किसी बुज़ुर्ग की लाठी काँपती दिखे,किसी बच्चे की आँख भर आए,या कोई जानवर तड़पता दिख जाए. उसका मन बेचैन हो उठता। लोग कहते-“इतनी संवेदनशील मत बनो, दुनिया बहुत कठोर है।” माही मुस्कुरा देती।क्योंकि उसके लिए करुणा कमजोरी नहीं थी- वह उसकी रीढ़ थी।
समय बीतता गया-
उसकी मेहनत रंग लाने लगी। वह परीक्षा पास करने के बेहद करीब थी। लेकिन उससे भी बड़ी जीत यह थी कि
उसने अपने भीतर की इंसानियत को कभी मरने नहीं दिया। गाँव में लोग कहते हैं-माही सिर्फ़ इंसानों की नहीं,
इस धरती की भी बेटी है।वह कोई साधारण लड़की नहीं। वह संवेदनाओं की वह नदी है जो बिना शोर किए, चुपचाप बहते हुए भी जीवन को सींचती रहती है।

One thought on “जहाँ शब्द नहीं थे, वहाँ माही थी…

  1. संवेदनाओं की नदी माही
    दर्द को नाम देती माही….
    बहुत खूबसूरत👏👏👏👏

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