
सुनीता मलिक सोलंकी, मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश)
कितने ही ऐसे
ज़रूरी विमर्श हैं,
जिनसे मुंह मोड़े
बैठा हर घर और समाज है।
बेहतर शासन-व्यवस्था में
आंकड़ों की अहमियत,
इनके संग्रह के उद्देश्य से
मिले समस्याओं का समाधान।
आत्महत्या…
आखिर क्यों करता इंसान?
इन पर निर्भर है जीवन का सार,
जीवन-मृत्यु के आंकड़े पार।
चर्चाएं सनसनी सी खोजें,
आरोप-प्रत्यारोप से होकर
सिमट हर घटना जाती।
कहीं हैं दस्तावेज खोते,
सामाजिक कलंक बढ़ते।
आत्महत्या को समझें,
परिजनों को खुलकर रोने तक न देती।
पर यह मानसिक कमजोरी नहीं,
इसमें अहं भूमिका रखती
कुछ आर्थिक कमजोरी भी।
यह मान रहा…
विश्व स्वास्थ्य संगठन भी
आत्महत्या रोकना संभव है।
रोकथाम के कारगर तरीके अनेक हैं,
बहुआयामी प्रयास करें हर कोई!