फुसफुसाहटों का ज़हर

शैफाली सिन्हा, लेखिका, नवी मुंबई

जब बराबरी नहीं कर पाते लोग,
तो शब्दों से वार करते हैं।
ख़ामोशी से नहीं,
फुसफुसाहटों में ज़हर भरते हैं।

ख़ासकर जब सामने एक स्त्री हो
तो निशाना आसान लगता है।
उसका सिंगार, उसके कपड़े,
उसका काजल तक उन्हें चुभता है।

ऑफिस में उसकी मेहनत रंग लाए,
तो वो तरक्की भी गुनाह बन जाती है,
और चरित्र—
हाँ, चरित्र सबसे पहले तौला जाता है।

कोई नहीं पूछता उसकी काबिलियत,
उसकी ईमानदारी, उसका संघर्ष।
बस उँगलियाँ उठती हैं,
और सवालों की बारिश होती है हर रोज़।

पर अगर एक स्त्री
अपने भीतर इतनी हिम्मत जगा ले
कि सच को सच कह सके
“हाँ, वो मेरा बॉयफ्रेंड था,
और उसके स्वभाव की वजह से
मैंने उसे छोड़ा है।”

तो वो सिर्फ़ अपना सच नहीं कहती,
वो आने वाली कई लड़कियों को बचाती है।
ऐसे लोग फिर हर किसी को
अपने मायाजाल में नहीं फँसा पाते।

सच की ये आवाज़
समाज को आईना दिखाती है,
और चुप्पी से पनपते अपराधों को
जड़ से हिला देती है।

स्त्री की सच्चाई अगर सम्मान पाए,
तो समाज दूषित होने से बचेगा।
क्योंकि डर में नहीं
हिम्मत में ही भविष्य सजेगा।

One thought on “फुसफुसाहटों का ज़हर

  1. Shaifali ji ….kaash aisa ho …..satri ki sacchai samman pa jaye ….
    Logo ko to lagta hai ….ki try karte raho ….kabhi na kabhi to maan hi jayegi ….woh sach bolkar na kahe tab bhi !

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