
सुरेश परिहार, संपादक, लाइव वॉयर न्यूज, पुणे
आज सुबह फिर वही हुआ. नहाने का मन नहीं हुआ. वैसे भी मैं रोज़-रोज़ सुबह नहा लूं, ऐसा कोई नियम तो है ही नहीं. मंदिर जाना, पूजा करना आदत में कभी था ही नहीं. नास्तिक भी नहीं, बस मेरे लिए ईश्वर का स्वरूप माँ-बाप ही हैं. जिन्हें देखा, जिनका स्नेह महसूस किया, वही मेरे भगवान.
पर असल वजह कुछ और थी कपड़े ढूंढने थे. आलमारी खोली तो कपड़े तो ढेर भर पड़े थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं. जैसे ही कपड़ों का वो अंबार आंखों में पड़ा, मन अचानक सालों पीछे लौट गया उस समय में, जब घर में नए कपड़े साल में बस दो बार आते थे स्कूल खुलने पर और दिवाली पर.
स्कूल के कपड़े 15 अगस्त या राखी तक संभाले जाते, और दिवाली वाले कपड़े कभी-कभी दशहरे पर सिलते. दशहरे पर पहने भी सही, पर दिवाली तक दोबारा पहनने की सख़्त मनाही. लक्ष्मी पूजन वाले दिन की अलग ही शोभा होती थी उन कपड़ों की. जैसे घर में नया मेहमान आया हो, सब उसे निहारते, संभालते.
कपड़ा बसंती दा की दुकान से आता (प्रहलाद धारविया के बड़े भाई) उन्हें हमारी हैसियत पता थी. इसलिए वही कपड़े दिखाते, जो बजट में हों. पर आँखें?…वो तो दूकान में लटकती रंगीन थानों पर ही टिकतींलाल, हरे, नीले, चेक, फूल, क्रीम.
और बाबूजी?…चुपचाप जेब टटोलते, दुकानदार से नज़र मिलाते.
उधारी पर ही सही, पर तीनों भाई-बहनों के कपड़े लेकर ही लौटते.
सिलाई की बात आती तो पूरा शहर हमारा परखा हुआ था रतनदा टेलर, एमआर टेलर्स, माधू महाराज, उन्हेल वाले, कांतिदा किसके यहाँ न गए?
सबकी एक खास आदत थी सिलाई कभी समय पर नहीं. लेकिन बाबूजी का नाम सुनते ही सबके चेहरे पर इज़्ज़त उतर आती. कपड़ा साधारण होता, पर उनकी आँखें चमक उठती वे बाबूजी का मन रखने के लिए कह देते-वाह, अच्छा कपड़ा है. जोरदार!
नाप लेते समय बाबूजी की वही लाइन
थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो टेलर सा, बढ़ती उमर है..क्योंकि कपड़े बड़े होकर पहनने होते थे.
शर्ट इतनी लंबी कि चड्डी के बिना भी पहनी तो दुनिया की नज़र झुकेगी नहीं. पेंट घुटनों से नीचे, जैसे समय के साथ बढ़ने की गुंजाइश छोड़ दी गई हो.डिलिवरी का दिन तय होता.
हम कहते-बुधवार? वो इंच-टेप गर्दन पर डालते हुए बोल देते-अगले बुधवार…और फिर इंतजार सबसे मुश्किल इंतजार. बुधवार आते ही स्कूल से भागते-भागते उनकी दुकान पहुँचते. वो मुस्कराकर कहते- अभी नहीं सिले अर्जेन्ट काम आ गया. दो दिन बाद ले जाना.दो दिन बाद फिर चक्कर. इस बार हमारी आंखें उनकी दुकान में टंगे कपड़ों की कतार में अपना कपड़ा ढूंढने में लगी होतीं. अगर बिना कटा कपड़ा किसी कोने में पड़ा दिख जाए, दिल जैसे धसक जाता..ये तो अभी कटा ही नहीं झूठ बोल दिया!…पर हम फिर इंतजार करते. उसी उम्मीद में कि अगली बार जाते ही नया कपड़ा हाथ में मिलेगा. जिस दिन मिलता घर आते-आते ही पहन लेते. आईने के सामने घूमते. नई शर्ट की वह महक नया होने की वो खुशी.
आज की मॉल की खरीदी हुई शर्ट में कहाँ?..आज आलमारी भरी पड़ी है,कपड़े हैं बहुत,पसंद भी अच्छी,पर वो इंतजार का रोमांच, वह खुशी, वह कदर कहीं खो गई है…पता नहीं क्यों,
कपड़े ढूंढते-ढूंढते बाबूजी दिखे…हां, वही दुकानदार से उधार की बात करते हुए,टेलर को कहने वाले..थोड़ा बड़ा सिल देना बच्चे बढ़ रहे हैं..और मैं?बस वहीं खड़ा,आंखें भीगती हुई, सोचता कपड़े तो आज भी हैं पर बाबूजी नहीं….
यादें, भावनाएं , एहसास, कहीं ओझल हो जाते हैं, जरूरतें सबसे जरूरी हो जाती हो जाती है। फिर दबते जाते हैं मन के एहसास
जरूरतों के बोझ के तले ।
बहुत सुंदर मासूम बचपन की यादें। आपकी यादों के साथ हमारा भी बचपन साथ-साथ दौड़ चला ।यही हालत हमारे साथ भी होते थे। एक थान से हम सारे ममेरे चचेरे भाई बहनों के कपड़े बनवाए जाते थे जिसे पहन कर हम किसी बैंड पार्टी की तरह नजर आते थे। आज तो शादी में या किसी फंक्शन में ऐसी थीम रखी जाती है। हम तो उस समय से एडवांस थे यह सोचकर होठों पर मुस्कुराहट आ जाती है। अद्भुत यादें आपकी👏👏 मजा आ गया पढ़कर🙏
बहुत ही सुंदर संस्मरण और प्रस्तुति .