…जब कपड़ा लंबा-सिलता था और बचपन भी

आलमारी खोली तो कपड़े बहुत थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं। कपड़ों का ढेर देखते ही बाबूजी याद आ गए जब साल में बस दो बार नए कपड़े सिलते थे। बसंती दा से उधारी में कपड़ा लेना, टेलर की दुकानों के चक्कर, “थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो, बच्चा बढ़ रहा है” की आवाज़, और नए कपड़ों के इंतज़ार का उत्साह… आज भले मॉल में पहनकर घर आ जाएं, पर वो इंतज़ार, वो खुशी, अब कहीं नहीं मिलती।

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“जब दिल धड़कता रहा, पर होंठ चुप रहे”

इतने सालों के बाद जब पीछे लौटकर देखता हूं, तो लगता है प्रेम और सौभाग्य कई बार मेरे दरवाज़े तक आए थे—पर मैं ही झेंपू, अनाड़ी और मौक़ा चूक जाने वाला रहा। कॉलेज की वो लड़की, लाइब्रेरी का वो एकांत, और वो घड़ी जब किसी के घर का पावभाजी मेरी याददाश्त का स्थायी हिस्सा बन गई—सब मुझे आज भी टटोलते हैं। और जब एक दिन किसी ने कहा, “तुम्हें ब्राह्मण समझकर बहन के लिए पसंद किया था,” तो लगा, क्या प्रेम जाति का मोहताज होता है?

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