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…जब कपड़ा लंबा-सिलता था और बचपन भी

आलमारी खोली तो कपड़े बहुत थे, पर एक भी प्रेस किया हुआ नहीं। कपड़ों का ढेर देखते ही बाबूजी याद आ गए जब साल में बस दो बार नए कपड़े सिलते थे। बसंती दा से उधारी में कपड़ा लेना, टेलर की दुकानों के चक्कर, “थोड़ो लंबो-जंबो सिलजो, बच्चा बढ़ रहा है” की आवाज़, और नए कपड़ों के इंतज़ार का उत्साह… आज भले मॉल में पहनकर घर आ जाएं, पर वो इंतज़ार, वो खुशी, अब कहीं नहीं मिलती।

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एक दिवाली बचपन वाली…

वो दिवाली, जिसमें दीपक छोटे थे, पर हमारी खुशियाँ बहुत बड़ी। जिसमें घर की सफाई भी खेल थी, और कबाड़ में से गुम चीज़ मिल जाना किसी खजाने से कम नहीं। जिसमें पटाखों की आवाज़ें नहीं… हमारी हँसी की गूँज ज़्यादा थी।जिसमें मिठाईयों की खुशबू थी, और त्योहारों में सजे संस्कार। वो दिवाली… जो परंपरा के साथ हमारी मासूमियत को भी रोशन कर देती थी।

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वो जो गुलज़ार थी …

मेरे नैहर की छत पर बनी वह छोटी-सी कोठरी कभी मेरे कच्चे सपनों से गुलज़ार रहती थी। उसकी छत की कड़ियों पर न जाने कितनी कोमल कहानियाँ लिखी थीं। दीवारों ने मेरे दिल की मीठी बातें सुनीं और खूँटियों पर मेरी अधूरी ख़्वाहिशें टँगी रहीं। चूने से पुती दीवार की दरारों में मेरी बचकानी कविताएँ छिपी थीं, जिन्हें आज खोजने पर भी नहीं मिलता।
आँगन में मेरी खिलखिलाहटों की गूँज थी, ज़ीने पर दौड़ते कदमों की थाप थी और दरवाज़ों पर हथेलियों की छाप। उस सँकरी दीवार पर, जो दो छतों को जोड़ती थी, मैं और दीदी दौड़कर एक साँस में पार किया करते थे। दादी की डाँट और राहगीरों की नज़रें उस खेल की गवाह रहीं।
वह कोठरी सिर्फ़ छिपने की जगह नहीं थी, बल्कि कच्ची उम्र की नासमझियों का अड्डा भी। वहीं छिपकर कच्ची अमियाँ खाईं, वहीं बरगद के पत्तों पर कुल्फ़ी रखकर चखी और वहीं किताबें माँ-दादी से छिपाकर पढ़ीं। सहेलियों और दीदी के साथ बैठकर हमने न जाने कितनी बहसें कीं, ज़माने को बदलने के सपने देखे।आज उस कोठरी में टूटी छत और लटकी शहतीरें हैं। और उन्हीं शहतीरों पर मेरे अधूरे, कच्चे सपने अब भी झूल रहे हैं।

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ख़त अपने नाम…

आज का खयाल सीधा दिल को छू गया—क्यों न खुद से ही अपनी कीमत पूछी जाए, बजाय दूसरों की नज़रों में ढूँढ़ने के। क्यों न एक ख़त खुद को लिखा जाए, जिसमें अपने ही बचपन की हँसी, अपनी ही रंगीन तितली-सी चंचलता, और अपनी ही खुशबू को फिर से महसूस किया जाए। जीवन की भाग-दौड़ में खोकर हम खुद को सँवारना भूल जाते हैं, लेकिन जब खुद से मुलाक़ात होती है, तो एहसास होता है कि सबसे बड़ा ख़िताब, सबसे सुंदर परिभाषा, हमेशा से हमारे अपने ही नाम थी।

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