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बेचारी बिल्ली

मेघा अग्रवाल, प्रसिद्ध लेखिका, नागपुर (महाराष्ट्र)

आंगन में अमरूद का पेड़,
मीठे, सुन्दर बच्चों-बड़ों के मन को भाए।
खिड़की से बाहर जब भी देखे,
बहूरानी का जी ललचाए।

खाट पर आंगन में बैठी माँजी,
असंभव है, चुपके से अमरूद खाए।
सोच रही है बहू,आखिर कैसे
इन अमरूदों तक हाथ पहुँचाए?

एक दिन माँजी को गहरी नींद में देखा,
झट से बहू ने अमरूद तोड़े।
खिड़की वाली मेज़ पर
अमरूद चुपचाप आकर रख छोड़े।

देख रही थी बिल्ली सयानी,
बहूरानी जी की ये चतुराई।
अम्माजी की बड़बड़ सारी,
सीधी-भोली बन गई बहूरानी।

लाचारी का सुर लगा रोने,
तभी बिल्ली ने मेज़ पर से
अमरूद मुँह में भरकर उठाए।
देखा जब सास-बहू ने
बहू ने फिर होश गंवाए!

होश संभाला जब बहू ने,
सास ने कहा“मुई बिल्ली ने
खा लिया है अमरूद सारा!”
हमने फिर उस कलौटी को
चप्पल–डंडे से पीट डाला।

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