नन्दकुमार आदित्य, बाणेर , पुणे
“उसने ऐसा क्यों कहा?”
दिल-ओ-दिमाग़ परेशाँ हैं,
सारी शिद्दत इसी बात पे,
ग़ुस्से पे आमादा हैं।
ज़रा ग़ौर करते तो इस पर
“उसको कहना क्यों पड़ा?”
उसकी जगह रखें हम ख़ुद को,
फिर देखें सब आसाँ है।
क्रोध से ही सम्मोह उपजता,
स्मृति-विभ्रम सम्मोह से;
यह सम्मोहन निकाला करता
बुद्धि-विवेक की खोह से।
बुद्धिनाश की परिणति ऐसी
आती विकट परिस्थिति जैसी;
अधःपतन अपना जुड़ता जब
हम शिकार की टोह से।
मन की सुनें बात अच्छी है,
इस पर भी पर ध्यान रहे;
मन भी भटका न करे कहीं,
मानस का भी अवधान रहे।
मानव हैं हम मानव रह लें,
दानवता न अपनाएँ;
मन-मानस में तालमेल हो,
अस्तित्व का भी संज्ञान रहे।