बोझ

वर्षा गर्ग, प्रसिद्ध लेखिका, मुंबई

अपने बेटे शुभम के साथ महानगर के सबसे बड़े मॉल में आई हूँ। यूँ तो हमेशा सबको लेने-देने के अनगिनत मौके ढूँढ़ा करती हूँ, पर दीवाली का उत्साह ही अलग होता है। अपने मन में बसे रिश्तेदारों, मित्रों, पड़ोसियों की सूची दोहराते हुए सभी के लिए कुछ न कुछ खरीद ही लिया।

बिल काउंटर पर पहुँचकर लाइन में इंतज़ार करते हुए मैं बेटे से बातें कर रही हूँ। भरी हुई ट्रॉली को एकटक देखते हुए अचानक शुभम ने पूछा- “आपने अपने लिए क्या खरीदा मम्मी?”

“अपने लिए…” उसकी बात दोहराते हुए मैंने कहा, “मुझे कुछ चाहिए ही नहीं, बस ये शैंपू और रुमाल लिए हैं। बाकी सब औरों के लिए है।”

“हमेशा ऐसा क्यों करती हो आप? कभी तो अपने बारे में भी सोचा करो, मम्मी। पता है, बाद में इन्हीं बातों से कितना असंतोष होता है।”

“तुझे पता तो है, मुझे सबको देने में ही सुख मिलता है।”

“फिर हर बात में शिकायत क्यों करती हो!
जानती हो, सबकी परेशानियों को लादे रहना आपका स्वभाव बन गया है। आज के समय में कोई किसी से कुछ नहीं चाहता, आप फिर भी जबरन औरों की फ़िक्र करती हो और चाहती हो कि अन्य लोग भी बिना कहे आपके बारे में सोचें। किंतु सबका स्वभाव एक जैसा नहीं होता, मम्मी।”

बेटे की बातें मन पर गहरी चोट कर रही हैं। कहीं न कहीं अहसास है कि शुभम सही कह रहा है। फिर भी मेरी हठधर्मिता उसे मानने को तैयार नहीं।

“तो फिर क्या-क्या किया करूँ, ये भी बता दो?”
मेरे स्वर की कड़वाहट छुप न सकी।

“करना कुछ नहीं है, सिर्फ़ ये याद रखिए कि जबरन लादी गई अपेक्षाओं से उपेक्षा के सिवाय कुछ नहीं मिलता।”

ट्रॉली का सामान वहीं छोड़, बेटे का हाथ पकड़े आगे बढ़ते हुए मेरे कदम मानो फूल से हल्के हो रहे हैं।

2 thoughts on “बोझ

  1. अपेक्षाओं के बदले उपेक्षा ,ज्यादातर हमारे दुख का कारण यही होते हैं .. बहुत ख़ूब लिखा है आपने 👌👌🌹

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *