बोझ
भीड़भाड़ वाले मॉल में ट्रॉली पकड़े खड़ी थी वह हमेशा की तरह दूसरों के लिए तरह-तरह की चीजें खरीदकर। बेटे की मासूम-पर-सीधी बात ने दिल में जैसे किसी ने सच का आईना रख दिया. “मम्मी, आपने अपने लिए क्या खरीदा?” वक्त जैसे ठहर गया। कितने सालों से वह अपने लिए कुछ चाहने तक की हिम्मत नहीं कर पाई थी। सबके लिए जीते–जीते वह खुद से कितनी दूर चली गई थी, आज बेटे ने वही याद दिला दिया।
