मोहब्बत में हार, जीवन में जीत…

अनंत, शहर में बड़े सपनों के साथ आया था, लेकिन पहली मोहब्बत ने उसे टूटने के कगार पर ला खड़ा किया। दृष्टि का धोखा, टूटे दिल और निराशा में वह समुद्र की ओर बढ़ा। तभी मां की आवाज़ ने उसे रोक दिया। मां की ममता और हौसले ने अनंत को जगाया, और उसने अपने सपनों और जिंदगी को फिर से गले लगाया। अब दर्द से सीख लेकर वह सफलता की ओर कदम बढ़ा रहा है।

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बोझ

भीड़भाड़ वाले मॉल में ट्रॉली पकड़े खड़ी थी वह हमेशा की तरह दूसरों के लिए तरह-तरह की चीजें खरीदकर। बेटे की मासूम-पर-सीधी बात ने दिल में जैसे किसी ने सच का आईना रख दिया. “मम्मी, आपने अपने लिए क्या खरीदा?” वक्त जैसे ठहर गया। कितने सालों से वह अपने लिए कुछ चाहने तक की हिम्मत नहीं कर पाई थी। सबके लिए जीते–जीते वह खुद से कितनी दूर चली गई थी, आज बेटे ने वही याद दिला दिया।

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राख में भी शेष चिंगारी

मैंने ठहरना सीखा है— क्योंकि भाग जाना हमेशा हार नहीं, पर ठहरना ही सच्ची जीत है। आँसुओं की छाँव में मुस्कराना मेरा स्वभाव है, और यही मेरी पहचान भी। धूप ने जलाया, आँधियों ने तोड़ा, फिर भी हर बार राख से उठी हूँ — अपनी ही चिंगारियों की गर्मी से। शब्दों के बाण चुभे, पर मैंने मौन को कवच बना लिया; समय की नदी में बहते हुए भी मैंने उफनाई लहरों पर बाँध बनने का साहस पाया।
टूटते चाँद की तरह कभी मन भी बिखरता है, पर उजाला कम नहीं होता। मैं जानती हूँ कि पीड़ा को शीतलता में कैसे बदलना है — जैसे मंदाकिनी बनकर अपने ही घावों को धोना। मैं नहीं भागती, क्योंकि हर ठहराव में मैं अपनी अस्मिता को फिर से गढ़ती हूँ। यही मेरी शक्ति है, यही मेरी पहचान।

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