
विजया डालमिया, प्रसिद्ध लेखिका, हैदराबाद
बचपन की यादें कर रही अठखेली
याद आ रही मुझको मेरी हर सहेली।
दिल में ज़िद पर उमंगें थी निराली।
ऐसी होती थी उन दिनों हमारी हर दिवाली।
आसमान में टिमटिमाते तारे और जमीन पर जगमगाते दीपक। अमावस की रात आसमान में चांँद की रोशनी नहीं होती, इसीलिए नन्हे-नन्हे दीपक अपना प्रकाश फैला कर हमें यह कहते हैं कि….” हम भी चांँद से कम नहीं”। चांँद सितारों की बातें, किस्से -कहानियां हमें घर के बड़े बुजुर्ग सुनाया करते और हम भी बड़े चाव से, ध्यान से उन्हें सुना करते थे। उनमें से एक किस्सा रामजी के वनवास से लेकर अयोध्या लौटने तक का भी होता था। हर दिवाली हम यह सोचते थे कि अगर राम नहीं होते तो शायद दिवाली होती ही नहीं और अगर दिवाली नहीं होती तो अमावस की रात इतनी उजली कैसे होती और हमें पटाखे कैसे मिलते? सच तो यह है कि सब के मुँह से और स्कूल में पढ़ -पढ़ कर यह वाक्य रट गया था कि …दिवाली हिंदुओं का सबसे बड़ा और प्रमुख त्यौहार है। पर सच पूछो तो हमारा बाल-मन दिवाली को इसलिए भी बड़ा मानता था कि दिवाली पर हम बच्चे बड़ों के साथ मिलकर बड़े-बड़े काम भी किया करते थे। हमारे लिए दिवाली यानी खूब मस्ती, तरह-तरह की मिठाइयांँ और नए कपड़े पहनकर मचलना। पटाखे छोड़ना। घर को सजाना। रंगोली के रंग बिखेरना।
दिवाली की लंबी छुट्टियों का लंबा इंतजार बड़ी ही बेसब्री से किया जाता था। दिवाली की छुट्टी है कहकर काम बहुत जोश से किया जाता था। दिवाली एंजॉय करनी है यह सोच कर स्कूल से मिला बहुत ज्यादा होमवर्क भी तपाक से जल्दी ही निपटा लिया जाता था। बड़ों के मुंह से हमेशा सुनते आए… “दशहरे के ठीक 20 दिन बाद दिवाली है। अब तो दिवाली को बहुत कम दिन रह गए” कहकर सफाई अभियान शुरू हो जाता ,जिसमें हम बढ़ चढ़कर हिस्सा लेते थे। सफाई अभियान में हम बड़ों के पास से हटते ही नहीं थे ।क्या पता… कब कोई चीज ऐसी निकल आए जो हमारे काम की हो? उनका कबाड़ हमारी खुशियों का खजाना था, मानो अलादीन का चिराग हो, रगड़ते ही खोई चीज मिल जाएगी, क्योंकि साल भर में गुम हुई चीजें इसी मौके पर अक्सर मिल जाया करती थी। कमरों को तितर-बितर हुआ देखना, पानी डालकर एक-एक खिड़की दरवाजे और फर्श को खूब रगड़ -रगड़ कर धोना हमारे लिए किसी मनोरंजक खेल से कम नहीं था ।सबसे लंबे बच्चे को ऊपर से चीजें उतारने का काम दिया जाता। जाले व पंखे की धूल जब हटाते थे तो कभी-कभी वहाँ चिड़ियों के घोंसले निकल आया करते, जिन्हें हम बहुत संभाल कर उतारते और सोचते कि चिड़िया ने यह किस तरह बनाया होगा? सर पर स्कार्फ बांधकर पूरे घर के जाले निकालने में बड़ा मजा आता था। सफाई होने के बाद चमकते घर को देखकर हमारा चेहरा भी चमक जाता था।
जैसे-जैसे खरीदारी के दिन करीब आते थे प्लानिंग शुरू हो जाती थी साथ ही हमारी जिद्द भी …यह चाहिए… वह चाहिए।बहुत सालों बाद समझ पाई कि ज़िद करके जो चीज हासिल होती है वह हमारे लिए बहुत मायने रखती है।हमें तो पटाखों के लिए भी जिद करनी पड़ती थी क्योंकि तब नहीं समझ पाए अब समझ आता है “आतिशबाजी” अर्थात मेहनत से कमाए पैसों को अपने ही हाथों से जला देना। तब बाल-मन ध्वनि प्रदूषण, वायु प्रदूषण यह सब नहीं समझ पाता था। सिर्फ मस्ती …मस्ती और मस्ती। सांप जलाते वक्त उसका ऊपर तक लहरा कर उठना और फिर नीचे गिर जाना बहुत मजा देता था । एक टिकिया जिसे जलाते से ही वह सांप के रूप में लहराते हुए कैसे ऊपर उठ जाती है वह हमारे लिए कौतूहल का विषय था ।फुलझड़ी को हाथों में लेकर जोर-जोर से घुमाया करते। उसकी चमकती रोशनी में हमारे मुस्कुराते चेहरे खिल उठते थे। चकरी जलाकर गोल -गोल घूमती हुई चकरी को एकटक देखना। एक साथ चार -पांच अनार जलाकर उसकी झिलमिलाहट में पता नहीं क्या ढूंढते थे।रंगीन माचिस, रस्सी ,पेंसिल जिन्हें जलाकर हाथों में थाम कर रोशनी की जाती थी। पता नहीं वह बचपन के भोलेपन वाली मस्ती की चमक थी या उनकी रोशनी की ….आज तक नहीं समझ पाई।छोटी-छोटी टिकली जिसे हाथ से दीवार पर रगड़ कर मजा लेते थे, तो कभी रिवाल्वर वाले में भरकर झूठ -मूठ की बंदूक बाजी को आतिशबाजी के साथ महसूस किया जाता था। जब अचानक किसी के कान के पास जाकर उससे शोर करते और वह डर जाता तो हम खुशी और शरारत से हँस दिया करते थे।लक्ष्मी बम,रस्सी बम ,यह सब एक कागज पे रखकर ,जलाकर दूर भाग जाते।उसके फटने की आवाज के पहले ही कानों पर हाथ रख लेते व आँखें बंद कर लेते थे डर के कारण। कितने नादान थे हम। धरपटक हाथों में लेकर पूरी ताकत से दीवार और जमीन पर फोड़ा जाता कंपटीशन में। लक्ष्मी-पूजन के समय बड़ी लड़ी फोड़ी जाती थी। जितनी बड़ी लड़ी उतनी देर तक कानों में उंगलियां लगाकर आँखें मिचमिचाते रहते।सबसे ज्यादा मजा दूसरे दिन आता जब सुबह जल्दी उठकर जले पटाखों के ढेर में से अच्छे पटाखे ढूंढे जाते ।सारी खुशी एक तरफ और उनमें से मिले पटाखों की खुशी एक तरफ। अपने प्लास्टिक की थैलियों में उन्हें इस तरह सहेजते जैसे कितना अनमोल खजाना सहज रहे हों।
दिवाली पर 5 दिनों तक नए कपड़े पहनने मिलेंगे यह सोच -सोच कर ही गुदगुदी होने लगती थी। उन दिनों नए कपड़े पहनने की इजाजत सिर्फ त्योहारों पर ही होती थी। नए कपड़ों के इंतजार में आशा की चमक लिए हमारी आँखें चमकती रहती थी। बचपन की दीवाली जिसमें आकर्षण था हमारी खुशियों का। हमारी उमंगों का आईना,जो दशहरे के दिन से शुरू होकर भाई-दूज के दिन तक रहता था। धनतेरस के दिन से घर में तरह-तरह के पकवान बनने शुरू हो जाते और सारा घर उन पकवानों की महक से महक उठता। नमकीन पारे, शक्करपारे ,पेठे, गुड़ की मीठी सुहाली(मठरी), नमकीन सुहाली ,गुझिया, कांजी-वडे, चने की दाल,भुजिया, काजू -कतली सब घर में ही बनता था।हम बच्चे बड़े चाव से दौड़-दौड़ कर सारे काम किया करते थे। मठरी सुखाना और उन्हें कांटे की नोक से गोदना हमारा प्रिय काम हुआ करता।हम सारी चीजों को ललचाई नजरों से देखते रहते क्योंकि हमें पहले ही फरमान सुना दिया जाता था कि …लक्ष्मी पूजन के बाद ही यह सब हमें खाने मिलेगा।
धनतेरस की रात आटे का एक चौमुखी दिया बनाकर उसमें कौड़ी रखकर उसकी पूजा की जाती। हम देखते जब तक वह दिया जलता था बड़े लोग वहीं बैठे रहते और उसके बाद उसमें से कौड़ी निकालकर लॉकर में रखते थे ।पूछने पर कहते….” इससे बरकत होती है, क्योंकि यह भी लक्ष्मीजी का ही स्वरुप है”। आज भी यह बात हम नहीं भूले। बड़े होने के बावजूद हमारे पर्स में हम आज भी कौड़ी रखते हैं।
रूप चौदस अर्थात नरक चतुर्दशी की पहली रात हमें नींद नहीं आती थी। दूसरे दिन क्या- क्या करना है ….
सारी प्लानिंग करते रहते ।सुबह जल्दी उठकर आटा, हल्दी और तेल मिलाकर एक खास उबटन तैयार कर कर दे दिया जाता था जिसे हम सारे भाई-बहन साथ बैठकर मस्ती करते हुए लगाते थे। वह सूखने के बाद जब रगड़ -रगड़ कर निकालते तो मैल देखकर बहुत खुश होते कि अब हम बहुत गोरे और सुन्दर दिख रहे हैं । उन दिनों बाथरूम में आईने नहीं होते थे।उस दिन हमारे सामान्य से बाथरूम में एक आईना ,रोली-चावल, माचिस, एक दीपक और एक नींबू रखा होता था। जिसमें नहाने के बाद हम दीपक जलाकर ,रोली से टीका निकालकर, नींबू हाथों में लेकर, आईने में अपना चेहरा देखते थे। यह सब आकर्षण ही तो हमारी खुशियों में चार चांँद लगाते थे। अब तो यह प्रथा ही समाप्त हो चली है ।समय के साथ बाथरूम का रूप बदला और साथ-साथ चलन भी। शाम के वक्त एक तारा दिखते ही दीप जलाकर, पटाखों की थैली हाथ में लेकर पटाखों का मजा लेना शुरु कर देते। नरक चतुर्दशी के दिन को हम छोटी दीवाली कहते थे व छोटे रूप में दीपक की पूजा करने के बाद उन्हें हर रूम में रखने के लिए बहुत लालायित रहते थे। मुझे आश्चर्य होता था कमरों के अलावा एक दीपक बर्तन मांजने की जगह भी रखा जाता था अर्थात घर का कोई भी कोना त्यौहार पर खुद को उपेक्षित महसूस ना करे तब यही समझ में आता था।
बड़ी दिवाली के दिन सुबह से घर को सजाने में लग जाते । फिर चाहे वह मांडना हो ,रंगोली हो या अल्पना। लक्ष्मी जी के स्वागत के लिए सजाई गई रंगोली पर दीपक रखते के साथ ही रंग अपनी छटा बिखेरने लगते । घर का हर कोना जगमगा उठता था।खजूर के पत्तों की डाली को दरवाजे के दोनों तरफ लगाकर उनके नुकीले सिरों पर फूल और खिल्ली से सजाया करते।आकाशदीप लटका कर देखने की ललक… किसका कितना ऊंचा है। नए पर्दे,नयी बेडशीट,नये गलीचे की बिछायत देखकर हम बेहद खुश होते थे। नए डोरमेट पर पांव पोंछने से ही डर लगता था …कहीं खराब ना हो जाए।
लक्ष्मी-पूजन के दिन बिल्ली अगर दिख जाती थी तो उसे घर के अंदर लाने की कोशिश करते क्योंकि बड़ों के मुंह से सुन रखा था दिवाली के दिन बिल्ली का आना शुभ होता है। बिल्ली के इंतजार में एक कटोरी में दूध भरकर घर के बाहर रखा जाता था।
शाम होने पर दीप जलाने का उतावलापन कि…..कब दीप जले और हम पटाखों का मजा लें।…कब लक्ष्मी पूजन हो और हमें पकवान खाने मिले। धूमधाम से लक्ष्मी-पूजन के बाद जल्दी-जल्दी आशीर्वाद लेकर हम धूम-धड़ाका करने में मशगूल हो जाते थे। घरवाले आवाज लगाते रहते पर हम बच्चे तो फुलझड़ी और चकरी में उलझे रहते थे। किसी चीज का कोई होश नहीं।
लक्ष्मी-पूजन के दूसरे दिन सुबह उठकर मंदिर जाने से ज्यादा इंतजार नए कपड़ों का रहता था जिसे पहन कर इतराते हुए अपने फ्रेंड्स को देखते थे और आँखों में एक ही मासूमियत का भाव…. मेरी ज्यादा अच्छी है।
दिवाली के दूसरे दिन मंदिर से आने के बाद गोवर्धन पूजा के लिए हम से गोबर मंगवाया जाता था और उस गोबर को एक आकार देकर गोवर्धन पूजा की जाती थी ,जिसमें हम सारे बच्चों को परिक्रमा के समय आवाज लगाकर परिक्रमा दिलवाई जाती थी।
फिर शुरू होता था दिवाली की बधाई का सिलसिला जिसके लिए हम अपने हाथों से ग्रीटिंग बनाया करते थे क्योंकि तब बड़ों की नजर में ग्रीटिंग कार्ड पर बच्चों का पैसा खर्च करना फिजूलखर्ची थी। हमारे हाथों के बने ग्रीटिंग कार्ड देखकर वे हमारा खूब हौसला बढ़ाते थे। दिवाली के दूसरे दिन से इंतजार रहता था रिक्शे में बैठकर अपने प्रियजनों के यहाँ जाने का। हर बच्चा यही इंतजार करता था कि आज किसे जाने मिलेगा। घरवाले पहले से ही समझा कर ले जाते …. “देखो वहाँ ज्यादा मत खाना”। पर खाने से ज्यादा रिक्शे में घूमने का जो आनंद हमें मिलता था वह हम कभी नहीं भूल सकते क्योंकि उन दिनों रिक्शा का चलन ज्यादा था।
भाई दूज के दिन बुआ जी के यहाँ सहपरिवार जाना और उनके बच्चों से मिलकर खूब मस्ती करना। जगह-जगह मंदिरों में अन्नकूट की प्रसादी लेने जाना यह भी बहुत खास काम होता था।
मेरे ख्याल से हर मध्यमवर्गीय की दिवाली एक जैसी ही होती थी ।शायद इन्हीं बातों से दिवाली की छुट्टियां हमारी सार्थक हो जाती थी ।हर त्यौहार के माध्यम से बड़ों ने हमें संस्कार सिखाए। मुझे याद है दिवाली के दिनों में जब हरे मच्छर बहुत ज्यादा हो जाते तो बड़े कहते थे….. अब यह दिवाली का तेल पीकर ही खत्म होंगे। उसके पीछे की बात बाद में समझ में आई कि तेल के दीपक जलाने से मच्छरों का नाश होता है। सकारात्मक ऊर्जा का विकास होता है और वास्तु दोष भी खत्म होता है। नन्हे से मिट्टी के दीपक अपने आप में कितनी खूबियां लिए होते थे यह हम बच्चे तब कहाँ समझ पाते थे। वह दिवाली अब कहीं खो गई हो गई है क्योंकि अभी के आधुनिक बचपन की तरह दिवाली भी आधुनिक हो गयी है।
दीपों की कतारों में झिलमिलाती रोशनी और बचपन अब कहाँ … अब तो डेकोरेटेड लाइट्स और डेकोरेटेड कैंडल से घर को सजाया जाता है। मिट्टी के नन्हे दिये आज भी इंतजार में है कि उनके हिस्से के कोने जगमगाने क्या राम को फिर से वनवास जाना पड़ेगा?
उस दौर की हर बात अलग थी।
दिखावा नहीं भावना प्रमुख होती थीं।
अच्छा लिखा।