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 दर्द

डॉ. नेत्रा रावणकर, उज्जैन

वक्त ने छीन लिया हमसे हर शख्स को
वरना कारवां तो हमारा भी  बड़ा था

हमने भी लिखे थे रेत पर इंद्रधनुषी हर्फ
लेकिन लहरों में मिटाने का जोर बहुत था

भयानक आंधी में भी आसमां था सलामत
पंछियों की चोंच में उस वक्त दाना नहीं था

अपनी खुद नुमाई पर यकीन था उसको
लेकिन शहर का माहौल बिगड़ा हुआ था

पूरी जिंदगी जिस पेड़ ने  छाँव दी उसको
उसी पेड़ से आज उसने रिश्ता तोड़ा था

जिंदगी भर दावतों पर दावतें देता रहा जो
आज उस शख्स की थाली में निवाला न था

अब आसमां की फिक्र छोड़ दी थी उसने
उठाकर जमीं को सर पर बस चलना  था

One thought on “ दर्द

  1. जीवन का सार बहुत अर्थपूर्ण लिखा
    आपके लेखन को शुभकामनाएँ

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