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रह गया तो रह जाने दो

रेखा हजारिका, प्रसिद्ध असमिया लेखिका लखीमपुर

(आसाम)

रह गया तो रह जाने दो,
कौन सी अब बड़ी बात हुई।
कुछ लम्हे छूट गए बस,
वो भी शायद नियति की सौगात हुई।

ना ज़मीन अपनी रही, ना आसमां,
ना तेरी हुई, ना मेरी जहाँ।
बस कुछ यादों की परछाइयाँ,
जो अब भी मन में ठहर सी गई हैं वहाँ।

दो दिन की ये ज़िंदगी थी,
कौन सदा के लिए निभाने का वादा था।
कल जो साथ था, आज दूर सही,
यही तो वक्त का इरादा था।

प्यार-मोहब्बत के दो मौसम,
थोड़ी सी हँसी, थोड़ा सा ग़म।
जो था, वो भी कम न था,
जो नहीं है, उसका गिला भी अब कम।

जी लो… जियो ओ ज़िंदगी,
हर पल को आखिरी समझकर।
क्योंकि आज जो साथ हैं,
वो कल की कहानी बन जाएंगे फिर।

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