रह गया तो रह जाने दो

जीवन क्षणभंगुर है, और प्यार भी कुछ लम्हों का होता है। कभी-कभी साथ रहते हुए भी पल दूर हो जाते हैं। यादें, थोड़ी खुशी और थोड़े ग़म के साथ, हमें हर पल जीना सीखना होता है। जो आज है, वह कल नहीं रहेगा, इसलिए हर अनुभव को पूरी गहराई से महसूस करना ही जीवन का सार है।

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जीवन के गीत गाते चलो

जीवन में अंधेरा, आंधियां और कठिनाइयाँ आती हैं, लेकिन विश्वास और साहस के साथ चलना ही जीवन का सार है। दुखों से आँखें मिलाकर आगे बढ़ते हुए, दीप जलाते और खुशियाँ मनाते हुए हम अपने जीवन के गीत गाते रहें। यही प्रयास हमें भीतर और बाहर दोनों जगह उजाला देने का सामर्थ्य देता है।

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यादों की बारिश

बीता हुआ अतीत अक्सर हमारे नयनों के सामने पल भर में जीवित हो जाता है, भूले-बिसरे गीत और बचपन की यादें याद दिलाते हैं। प्रेम, स्मृतियाँ और खोए सपने हमें बार-बार छूते हैं, चाहे हम कितनी भी ताकत जुटाएँ। कुछ यादें इतनी गहरी होती हैं कि उन्हें भुलाया नहीं जा सकता . वे हमेशा हमारे मन और दिल में जीवित रहती हैं।

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रोशनी के दोहे

दीपों के इस पर्व में घर-घर उजाला फैलता है और खुशियाँ अपार होती हैं। सज-धज कर बाजारों में रौनक है, फूल और मिठाइयाँ बिक रही हैं। हर मन में राम की ज्योति बसती है और प्रीति व उजाला हर ओर दिखाई देता है। अहंकार और वहम को छोड़कर प्रभु का नाम जपने से, अच्छे कर्मों के माध्यम से सुख और शांति प्राप्त होती है।

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हिंदी दिवस

यह कविता हिंदी भाषा के महत्व और सांस्कृतिक धरोहर को उजागर करती है। इसमें बताया गया है कि हमारी भावनाएँ, प्रेम, ज्ञान और भक्ति—सभी हिंदी में अभिव्यक्त होती हैं। पहले शब्दों से लेकर वेद, उपनिषद और गीता तक, पूजा-अर्चना और भजन तक, हिंदी भाषा हमारे जीवन और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। हिंदी दिवस का यह संदेश हमें अपनी मातृभाषा को पढ़ने, लिखने और अपनाने के लिए प्रेरित करता है।

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हिंदी हमारी भाषा

हिंदी हमारी मातृभाषा है, सहज अभिव्यक्ति और समृद्ध शब्दों वाली, जिसका आधार संस्कृत में है। यह भाषा भारतीयों के लिए भाव, सौंदर्य और संस्कृति का प्रतीक है। हिंदी हमें अनुभूतियों, छंद, अलंकार और दोहों के माध्यम से जोड़ती है। यह माँ के आँचल जैसी शीतलता देती है, और जनमानस में गंगा की तरह पावन तरंगें फैलाती है। हिंदी साहित्य का उपवन हमेशा सुवासित और पल्लवित रहे, यही हमारी कामना है।

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दिल की भाषा

हिन्दी केवल एक भाषा नहीं, बल्कि दिल और दिमाग का मिलन, आपसी तालमेल और संस्कृति का प्रतीक है। यह राष्ट्रीय भाषा न होकर भी हर व्यक्ति के भीतर निकलने वाली आवाज़ है, मौखिक और लिखित संचार का जरिया है। नए ज़माने के साथ इसे भूलना नहीं चाहिए, क्योंकि यह धरोहर है जिसे संभाल कर रखना आवश्यक है।

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मैं हूं सूखी लकड़ी..

मैं सूखी लकड़ी हूं, जीवन में हितकारी और हर रूप में कल्याण फैलाने वाली। मैं शिव के मस्तक पर सजती हूं, कृष्ण की बांसुरी की तान में झूलती हूं, घरों में झूले और पलनों का आधार बनती हूं, और रोगियों का उपचार भी करती हूं। हर कदम पर मेरी उपस्थिति है—सृष्टि, श्रद्धा और जीवन के हर पहलू में। यही मेरी शक्ति और पहचान है।

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