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जीवन के गीत गाते चलो

डॉ. आशासिंह सिकरवार, प्रसिद्ध लेखिका, अहमदाबाद

है अंधेरा तो क्या,
दूर उजाला तो क्या।

माना कि रात काली घनी है,
बात भी अभी नहीं बनी है।
मन में
विश्वास भरकर चलो,
एक दिन बात भी बन जाएगी,
एक दिन सुबह आएगी।

आंधियां चल रही हैं तो क्या,
गर्म हवाएं चल रही हैं तो क्या।
निडर होकर खड़े रहो,
तुम साहसी बनो।

दर्द सहते जाना है, कब तक?
दर्द से आंखें मिलाकर चलो,
दुःख की घड़ी बीत जाएगी,
सुख का सूरज उगाते चलो।

हैं अकेले तो क्या,
इतनी मुश्किल है तो क्या।
तुम मुस्कुराते चलो,
तुम दीप जलाते चलो।

तुम दीपक जलाते रहो,
तुम खुशियाँ मनाते रहो।

ये अंधेरा भी छंट जाएगा,
नया प्रकाश फिर आएगा।
इंसान बनकर जन्म लिया,
धरती का कर्ज चुकाते चलो।

तुम जीवन के गीत गाते चलो,
इस गुलशन को महकाते चलो।

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