
अंजू ओझा, प्रसिद्ध लेखिका, पटना (बिहार)
सुन लो सुनीता, अब से तुम अपने परिवार की चार रोटियाँ खुद ही सेंक लेना। सब्जी और दाल मैं बना दिया करूँगी, और सास–ससुर के खाने की ज़िम्मेदारी भी मेरी ही होगी, क्योंकि मैं इनकी बड़ी बहू हूँ।”
जेठानी ललिता तमककर बोलते हुए अपने कमरे में चली गई।
मायूस सुनीता हतप्रभ रह गई कि आज भाभी को क्या हो गया है! रसोईघर में हाथ बँटाने के अतिरिक्त कपड़ा-लत्ता भी वह ही सरियाती थी। ऑफिस से लौटते हुए सब्ज़ी ले आती ताकि जेठजी–ससुरजी का भार हल्का हो सके।
उसने सोचा — हो सकता है भाभी का मूड ऑफ हो, शायद भैया से कहासुनी हुई हो, लेकिन यह सिलसिला दस दिनों तक चलता रहा।
अब उसे अपना और पति राघव का लंच तैयार करने के लिए रोटियाँ-पराठे खुद ही बनाने पड़ते, जिससे ऑफिस रोज़ पंद्रह मिनट देर से पहुँचती। ऊपर से बॉस की चिल्लपों अलग!
एक दिन झल्लाहट और उकताहट से भरी सुनीता पति राघव पर चिल्ला पड़ी —
“देखो ना! भाभी को क्या हो गया है? किचन में दाल-सब्ज़ी बनाकर रख देती हैं, लेकिन हमारे लिए रोटियाँ नहीं बनातीं। कहती हैं — तुम बना लो! और तो और, मुझसे ढंग से बात भी नहीं करतीं। पता नहीं किस बात का खुन्नस पाल रखी है। जैसे वो इस घर की बहू हैं, वैसे ही मैं भी तो हूँ! तो क्या वो हम पर रोब झाड़ेंगी? हद है! क्या मैं उनके जैसी घर पर खाली बैठी हूँ? चार पैसे कमाने जाती हूँ, रोज़ सब्ज़ी-भाजी लेती आती हूँ। अब बताओ, क्या रंज है उनको?”राघव ने कहा, “देखो सुनीता, इस बारे में तुम सीधे-सीधे बड़ी भाभी से बात कर लो,” और पल्ला झाड़ते हुए कमरे से निकल गया।“हे भगवान! ये भी मेरी नहीं सुनते। लगता है सास से बात करनी ही पड़ेगी,” सुनीता बुदबुदाई।
“माँ, कैसी हैं आप?”
सुनीता को अपने कमरे में देखकर सास की आँखें आश्चर्य से फैल गईं — आज सूरज पूरब से नहीं, पश्चिम से निकला क्या!
“क्या हुआ बहू?”
“माँ, बड़की भाभी को क्या हुआ है? वो कटी-कटी सी रहती हैं हमसे।”
सास मुस्कुराईं —
“देखो छोटी बहू, तुम समझदार हो। अगर तुम्हें लगता है कि ललिता तुम्हारी उपेक्षा कर रही है, तो ज़रा सोचो, कहीं न कहीं चूक तुमसे भी तो हो सकती है। भले ही तुम कमाऊ हो, लेकिन वो भी इस घर-परिवार को पंद्रह साल से बखूबी सँभाल रही है। और तो और, तुम्हारे बच्चों का लंच भी वही बनाकर देती है, दोपहर को खाना खिलाती है।शाम को जब तुम लौटती हो, तो सब्ज़ी भले ही ले आती हो, लेकिन उसे धो-काटकर देना भी तो बनता है। अपने लिए चाय बनाकर कमरे में आराम करने चली जाती हो और फिर सीधे नौ बजे खाने के समय निकलती हो। बना-बनाया खाना परोस देना मदद नहीं कहलाता, असली मेहनत तो सब्ज़ी काटने और आटा गूँथने में है। थोड़ा-बहुत आराम के बाद रोटियाँ बेलने में तो बड़की को मदद कर सकती हो ना! लेकिन नहीं…”
सास की कही एक-एक बात से सुनीता सहमत हो गई।
सोचा अगर मैं कमाती हूँ तो इसका मतलब यह नहीं कि भाभी घर पर आराम फरमा रही हैं। वे भी दिनभर चूल्हा-चौका सँभालती हैं।कम से कम सब्ज़ी-दाल तो बनाती थीं, गनीमत है! वरना बहुत-से घरों में जेठानी–देवरानी का “हाड़ का झगड़ा” मशहूर है।इज़्ज़त पाना है तो इज़्ज़त देना ही होगा।
अगले दिन से सुनीता ने किचन की कमान सँभाल ली।
नाश्ते में पोहा खुद बनाती, सबको चाय-नाश्ता परोसती और भाभी को ज़बरदस्ती खिलाती।
ललिता अचरज में थी, पर मन ही मन प्रसन्न भी – देवरानी को अक्ल आ गई!
सुनीता अब सब्ज़ी काट-छाँटकर रखती, दाल गैस पर चढ़ा देती और आटा भी गूँथ देती। फिर ऑफिस चली जाती।
ललिता मुस्कुरा उठती – “चलो, देवरानी को सद्बुद्धि तो आई!”
बहुत अच्छी कहानी।
बहुत सुंदर कहानी 👌👌