
स्वधा रवींद्र “उत्कर्षिता” प्रसिद्ध साहित्यकार, लखनऊ
मैं ठहर कर ही स्वयं के मान को सम्मान दूँगी,
भागने को हार ही मैं मानती हूँ…
छाँव अपने आँसुओं की ओढ़कर भी मुस्कराऊँ,
मैं यही पहचान अपनी जानती हूँ…
धूप से मैं जल चुकी हूँ, पर उजालों से न डरती,
आँधियों ने खूब तोड़ा, किन्तु मैं फिर-फिर संभलती।
राख में भी शेष हैं चिंगारियों की शक्ति अब भी,
मैं जिसे दे प्राण अपने, फिर जलाना जानती हूँ।
भागने को हार ही मैं मानती हूँ…
मैं यही पहचान अपनी जानती हूँ…
शब्द-बाणों से हुई आहत, मगर चलती रही मैं,
मौन का लेकर कवच, बस ध्येय तक बढ़ती रही मैं।
मैं समय की इस नदी में बह रही हूँ साथ उसके,
किन्तु उफनाई नदी पर बाँध बनना जानती हूँ।
भागने को हार ही मैं मानती हूँ…
मैं यही पहचान अपनी जानती हूँ…
चाँद टूटा भी अगर, तो कब उजाला कम हुआ है,
मन अगर रोया कभी, क्या शक्ति से वह अनछुआ है?
हो भले ही रिस रहा लावा हमारे तप्त मन से,
किन्तु मैं मंदाकिनी बन, घाव धुलना जानती हूँ।
भागने को हार ही मैं मानती हूँ…
मैं यही पहचान अपनी जानती हूँ…
धन्यवाद रचना को साझा करने के लिए
अति उत्तम
स्वधा रवींद्र जी
बहुत अर्थपूर्ण लिखा है.