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राख में भी शेष चिंगारी

मैंने ठहरना सीखा है— क्योंकि भाग जाना हमेशा हार नहीं, पर ठहरना ही सच्ची जीत है। आँसुओं की छाँव में मुस्कराना मेरा स्वभाव है, और यही मेरी पहचान भी। धूप ने जलाया, आँधियों ने तोड़ा, फिर भी हर बार राख से उठी हूँ — अपनी ही चिंगारियों की गर्मी से। शब्दों के बाण चुभे, पर मैंने मौन को कवच बना लिया; समय की नदी में बहते हुए भी मैंने उफनाई लहरों पर बाँध बनने का साहस पाया।
टूटते चाँद की तरह कभी मन भी बिखरता है, पर उजाला कम नहीं होता। मैं जानती हूँ कि पीड़ा को शीतलता में कैसे बदलना है — जैसे मंदाकिनी बनकर अपने ही घावों को धोना। मैं नहीं भागती, क्योंकि हर ठहराव में मैं अपनी अस्मिता को फिर से गढ़ती हूँ। यही मेरी शक्ति है, यही मेरी पहचान।

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