दिल, दर्द और दमखम

यह ग़ज़ल इंसानी समझ, रिश्तों की पेचीदगियों, आत्मसम्मान और देशप्रेम के सूक्ष्म भावों को बेहद नफ़ासत से पिरोती है। कभी दुनिया की चालाकियों पर तीखा सवाल उठाती है, तो कभी अपने ही घावों को मरहम की तरह सँभाल लेने का सलीका दिखाती है। इश्क़ की कोमल धड़कनों से लेकर हमदम और रकीब की पहचान तक हर शेर एक अलग दुनिया खोलता है। अंतिम शेर ग़ज़ल को असाधारण ऊँचाई देता है, जहाँ धर्म से ऊपर उठकर वतन को सर्वोपरि माना गया है। यह सिर्फ शायरी नहीं, जीवन के अनुभवों की तराशी हुई सच्चाई है।

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” बाऊजी “

बाऊजी को रिटायर हुए पंद्रह साल बीत चुके थे। माँ के जाने के बाद उनकी दुनिया जैसे सूनी पड़ गई थी, इसलिए मैं उन्हें दिल्ली से मुंबई अपने पास ले आया। हर संभव सुविधा देने की कोशिश करता रहा दवाइयाँ, ताज़ा फल, सुख-सुविधाएँ पर बाऊजी का मन हमेशा उसी पुराने घर में अटका रहता जहाँ माँ की यादें थीं। एक सुबह दूध की एक गिलास ने सब कुछ उजागर कर दिया. दूध में पानी, और मेरे हिस्से में शुद्ध दूध। पापा के सामने मेरा सिर झुक गया। उन्होंने बात को हँसकर टाल दिया, पर उनके स्वर की कंपकंपाहट मेरे मन पर चुभ गई।

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राख में भी शेष चिंगारी

मैंने ठहरना सीखा है— क्योंकि भाग जाना हमेशा हार नहीं, पर ठहरना ही सच्ची जीत है। आँसुओं की छाँव में मुस्कराना मेरा स्वभाव है, और यही मेरी पहचान भी। धूप ने जलाया, आँधियों ने तोड़ा, फिर भी हर बार राख से उठी हूँ — अपनी ही चिंगारियों की गर्मी से। शब्दों के बाण चुभे, पर मैंने मौन को कवच बना लिया; समय की नदी में बहते हुए भी मैंने उफनाई लहरों पर बाँध बनने का साहस पाया।
टूटते चाँद की तरह कभी मन भी बिखरता है, पर उजाला कम नहीं होता। मैं जानती हूँ कि पीड़ा को शीतलता में कैसे बदलना है — जैसे मंदाकिनी बनकर अपने ही घावों को धोना। मैं नहीं भागती, क्योंकि हर ठहराव में मैं अपनी अस्मिता को फिर से गढ़ती हूँ। यही मेरी शक्ति है, यही मेरी पहचान।

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