जरूरी

मानसिंह शरद, प्रसिद्ध लेखक, उज्जैन (मध्यप्रदेश)

” तू अच्छी तरह जानती है। शहर में तीन दिन से कर्फ्यू लगा था। आज हटा तो बड़ी मुश्किल से दोसौ रुपए की मजदूरी हुई। कल बाबा का श्राद्ध है। ला झोला दे, कुछ किराना ले आता हूं “
चप्पल पहनते हुए दामोदर ने पत्नी से कहा।
” किराना लाने के पहले अम्मा की तबियत भी देख लो। सुबह से अभी तक पांच बार उलटी कर चुकी है। बुखार भी तेज है।”
“फिर तू ही बता क्या करूं?”
“बताना क्या है? नुक्कड़ वाले डॉक्टर साहब के वहां ले चलते हैं। अम्मा को उनका ही इलाज लगता है।”
“पर वो तो एक बार में ही दोसौ रुपए से ऊपर की दवाई देते हैं। पचास रुपए के जमाने गए।”
“अब जो भी हो इलाज तो करवाना है। अम्मा की तकलीफ मुझसे से नहीं देखी जाती।”
” हां सही कह रही हो। चल अम्मा को डॉक्टर के पास ले चलते हैं। अभी ये ज्यादा जरूरी है।”

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