
मौसमी चंद्रा, प्रसिद्ध साहित्यकार,पटना
कभी लगता है
मेरे भीतर एक अदृष्ट संसार है!
जहाँ स्मृतियाँ
कवियों की तरह ठहरी हैं!
कहीं वर्जीनिया का मौन है
तो कहीं मीरा का विस्मय!
और कहीं बिखरी है
अजनबी औरतों की अधूरी पड़ी चिट्ठियां
उन सबके बीच मैं अपने विचारों को
हर रात थोड़ा और खो देती हूँ…
जैसे कोई ज्योत
अपने ही प्रकाश से थक गई हो!
फिर तुम आते हो
अपनी निस्पंद धड़कनों में आसरा लिए!
और मैं थके हुए शरणागत की भांति,
रख देती हूं अपने हृदय का सारा भार!
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शुक्रिया सर
सुन्दर
Thank u
मौसमी चन्द्रा जी
आपने मीराबाई को अपनी स्मृति में फिर से जिन्दा कर दिया और उसके दर्द को अपने लेखन में बहुत खूबसूरती से उतारा ।
बधाई स्वीकार कीजिए।
मीरा को अपने समाज और पति से जो ज़हर मिला , उसका निदान
भगवान ने उसे अपनी शरण में लेकर कर दिया ।
आपकी कविता का यह सन्देश बहुत अर्थपूर्ण है ।
प्यारी रचना