
ज्योति सोनी, प्रसिद्ध लेखिका, अलवर (राजस्थान)
लहरों को बाहों में समेटे हुए मैं,
अथाह समंदर को समेटती हुई,
अक्सर अपने सपनों के
झरोखे भी खोल देती हूँ,
जहाँ मेरे अंतहीन प्रेम का उत्साह छलक रहा हो।
ये लहरें मुझे बुलाती हैं,
मेरी परछाई को चुराती हैं,
मुझे मेरी ही छवि दिखाती हैं,
और मैं अपने आप से
उन लहरों को समेटने की ज़िद करती हूँ।
मेरी इस ज़िंदगी के
छोटे-से सफ़र की गवाह
ये लहरें मुझे कभी भी
भटकने नहीं देतीं, बहने नहीं देतीं।
विश्वास करना
ये लहरें मेरी अपनी सखी हैं।
Beautiful lines🤗