दिल को छूती मौन की गूँज…

रेखा हजारिका, प्रसिद्ध लेखिका, लखीमपुर (आसाम)

निशिगंधा की महक से जग उठा,
सारा आसमान।
आँखों में मौन की दो धाराएँ—
गंगा और यमुना बह रही थीं।

क्या खोने का दुःख है,
क्या पाने की खुशी है?

इतनी गहरी नींद में सोने की आदत कहाँ थी,
इतना डूब जाना, इतना खो जाना।

मिट्टी के दीयों की रौशनी में,
प्रार्थना और शांति पिघल कर पंचतत्व में विलीन हो गई।

एक गीत गूँज रहा है,
हर दिल को छू रहा है।

8 thoughts on “दिल को छूती मौन की गूँज…

  1. अच्छे शब्दों के प्रयोग से कविता में साहित्यिक सुगंध का सुन्दर समावेश 🙏

    1. बहुत सटीक और सुन्दर दीयों की रौशनी
      का वर्णन । लगता है आत्मा की चिर प्यास की कहानी का सही आकलन आपने किया है ।
      मन छू लिया इस काव्योक्ति ने :—-
      ” मिट्टी के दीयों की रौशनी में,
      प्रार्थना और शांति पिघल कर पंचतत्व
      में विलीन हो गई।”

      एक गीत गूँज रहा है,
      हर दिल को छू रहा है।

    2. अच्छा प्रयास मन के भावों को प्रकट करने का 🙏शुभकामनायें

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