gulmohar

हरी दूब

“हरी दूब” कविता जीवन की आपाधापी में सुकून के छोटे-छोटे क्षणों की तलाश है, जहाँ आकाश के बदलते रंग, श्रमिक की दुआ और घास की मुलायम हरियाली मिलकर मनुष्य को ठहरने और महसूस करने का अवसर देते हैं।

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दरिया और किनारा

कविता में दरिया को जीवन के संघर्ष और पवित्रता का प्रतीक बनाया गया है। दरिया मस्ती और ऊर्जा के साथ बढ़ती है, अपने रास्ते में आने वाली सभी बाधाओं को पार करती है, किनारों से संबंध बनाए रखती है और दूसरों के कष्ट और पापों को समेटती है। यह अपने गंतव्य की ओर दृढ़ता और गति से बढ़ती है, अंततः समुद्र की विशाल बाहों में विलीन होकर अपने सफर का निष्कर्ष प्राप्त करती है। यह कविता दर्शाती है कि जीवन में चाहे कितनी भी बाधाएँ आएँ, संयम, धैर्य और अपने मूल्यों के साथ मार्ग पर बढ़ते रहना ही सफलता की कुंजी है।

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निशिगंधा के फूल, मिट्टी के जलते दीये और चाँदनी रात में नदी किनारे ध्यानमग्न स्त्री

दिल को छूती मौन की गूँज…

“निशिगंधा की महक से जग उठा संसार, आंखों में बह रही गंगा और यमुना की धाराएँ। मिट्टी के दीपों की रौशनी में प्रार्थना और शांति पंचतत्व में विलीन हो रही हैं, और एक गीत हर दिल को छूते हुए गूँज रहा है।”

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