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“अस्तित्व”

डॉ. नेत्रा रावणकर प्रसिद्ध लेखिका, उज्जैन

दुर्गम पहाड़, घना जंगल
कंटीली, पथरीली राह
चलना तो पड़ेगा ही
पथिक बनकर।
ठोकर लगी तो जख्म होंगे,
पुराने जख्म फिर से
हरे-भरे होंगे।
सिलसिला रहेगा जारी,
फिर भी कहीं कुछ
बचा रहेगा।
जैसे……

गहरे नीले आसमान में
छोटा सा काला बादल,
गर्म रेगिस्तान में
हरा-भरा पेड़,
रात के अंधेरे में
टिमटिमाता जुगनू,
घर की दीवार के आलिया में
नन्हा सा दीपक,
खिड़की में टंगा
पीली रोशनी वाला कंदील,
बहुत अंदर-अंदर तक
उड़ने वाला पंछियों का झुंड,
ह्रदय के कप्पे में
यादों के इत्र की छोटी सी कुप्पी,
एक मिट्टी का खनकता गुल्लक।

ये सब गुप्तधन
पर्याप्त होते हैं
अस्तित्व के साथ जीने के लिए।

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