
इला सिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार, लखनऊ
दीप बनकर जलने दो
रौशनियां रंग लेने दो
इंतहा है कैद की अब
खुलके जरा हँस लेने दो
नदी बहती है जो अंतस
तोड़ दो उसके किनारे
भीग जाने दो जहां को
खोल दो अब बाँध सारे
राग जो भूले हुए थे
ताल से भटके हुए थे
भूलकर अब खलिश को
गीत वो गा लेने दो
रंग उतरा है चुनर का
फीका सब ढंग घर का
लूटकर रंगरेज के रंग
स्वप्न अब रंग लेने दो
घुट रही हैं जो हवाएँ
बंद दरवाजों के अंदर
है निशा अब जा चुकी
पट समय के खोलने दो
क्या कहने! बहुत अच्छी लगी रचना!
बहुत शुक्रिया रश्मि जी
बहुत सुन्दर 🙏
बहुत शुक्रिया रूवी