नई सोच

ज्योति सोनी वैदेही, अलवर (राजस्थान)

सब नई पीढ़ी के बच्चों में दोष निकालते रहते हैं—संस्कार से रहित, रील पर बेतुके नाच करती, जुए और नशे के जाल में डूबी, किंकर्तव्यविमूढ़ आज की पीढ़ी।
लेकिन इन सबके बीच यह घटना एक कहानी बनकर सामने आई। कल एक बस यात्रा के दौरान, एक पच्चीस साल के युवक से बातचीत के दौरान जो अनुभव हुए, उससे मेरे मन में नई पीढ़ी के इन्हीं आधुनिक बच्चों के प्रति सम्मान और श्रद्धा का भाव प्रबल हो उठा और सोच भी बदलने पर मजबूर हो गई।
हमारे बच्चे भी कदम बढ़ाकर हमारे साथ हैं, इसका एक संकेत मिला है। संकेत शुभ है मेरी नज़र में। आजकल के भी सब बच्चे एक जैसे नहीं होते। अगर हम उनका बचपन से पालन-पोषण सावधानी से करें, तो दुनिया की कोई ताकत उन्हें डिगा नहीं सकती, भटका नहीं सकती।
एक बस यात्रा में पास की सीट पर एक पुलिस की वर्दी में लगभग 25 साल का युवा, नमस्ते कहकर बोला – “आंटी जी, कहाँ जाएँगी?”
मैंने कहा – “अलवर।”
उसने कहा – “मैं दिल्ली से हूँ, और एक केस के गवाह के साइन के लिए आपके उधर किसी लक्ष्मणगढ़ गांव तक जाऊँगा। ज़रा सहायता कीजिए कि अलवर से कौन-से रूट पर यह गांव है।”
मुझे पूरी जानकारी थी, सो मैंने रास्ता बता दिया। आगे इसी तरह बात करते-करते मैंने पूछा – “बेटे, आपकी नौकरी कब लगी?”
वह बोला – “अभी 6 महीने हुए।”
“शादी हुई है?”
उससे पूछा।
सहज भाव से बोला – “सगाई हुए 2 साल हो गए, आंटी। शादी में अभी 6 महीने और लगेंगे।”
मैंने कहा – “बेटा क्यों? इतना लंबा रिश्ता कौन रखता है आजकल?”
उसने बड़ी सरलता से कहा – “आंटी, कारण जानोगी तो बात समझ आ जाएगी।”
तो कारण अब सुनिए और समझिए।
मेरी सगाई हुई। मेरे ससुर पुलिस में ही हैं। दिल्ली में अच्छी संपत्ति है। उनके एक पुत्र और एक ही पुत्री।
मेरी सगाई के 2 महीने बाद ही उनके इकलौते पुत्र की मृत्यु हो गई, जिसकी उम्र लगभग 15 साल थी। उनकी पुत्री 19 वर्ष की। अब सगाई तो हो चुकी थी।
मगर मैं थोड़ा अपसेट था कि अब उनका क्या होगा!

काफी रिश्तेदार कह रहे थे – “जमाई को घर रख लो।”
कोई कह रहा था – “मेरा बेटा गोद ले लेना।”
मेरा जमीर यह सहन नहीं कर पा रहा था कि मैं घर-जमाई बनकर बिना कमाए उनकी संपत्ति का वारिस बनकर बैठ जाऊँ।
तो मैंने अपनी साइड के 5 आदमी इकट्ठे लिए और उनके घर गया। वहाँ मैंने निर्णय दिया कि अब मैं आपकी बेटी से शादी नहीं करूँगा।
उन्हें सुनते ही धक्का सा लगा – “बेटा, भगवान ने ही हमें भारी दुख दिया है और आप भी ऐसा करोगे तो हम तो जी नहीं पाएँगे।”
तो मैंने कहा – “मेरी एक शर्त है, मैं तभी शादी करूँगा।”
सबको लगा, लड़का तमाम जायदाद पर हक लिखवाना चाहता होगा।
तब मैंने अपना विचार रखा –
“मेरी पत्नी सदैव आपके दुख में पागल न रहे, कोई आपकी संपत्ति छीनकर आपको पीड़ित न कर सके, कोई मुझे अपना आत्मसम्मान गिरवी रखने वाला पापी न बता सके, इन सबका हल यही है कि आप एक संतान और उत्पन्न करें।”
सबके मुँह खुले रह गए!
सबने विरोध किया।
काफी गहमागहमी और पाँच-सात दिन की लगातार बहस के बाद वे राजी हो गए। तब मैं उन्हें डॉक्टर के पास ले गया।उनका IVF तकनीक से ट्रीटमेंट हुआ। भगवान की इच्छा भी हमारे सही उद्देश्य को पूर्ण करती नज़र आई और उनके पुत्र का जन्म हुआ।
अब पुत्र के जन्मोत्सव पर ही मैं विवाह करके अपनी पत्नी को घर ले आऊँगा, उनके पास उनका जीने का एक लक्ष्य छोड़कर आऊँगा।
इस बात में यात्रा तो बीत गई, पर मैं तब से उसी नई पीढ़ी के युवा की सोच पर हर्षित हूँ, अचंभित हूँ।
सोच रही हूँ—विचार नए हैं, मगर दिल संस्कार, प्रेम और समझ से कितना भरा हुआ है।
शायद नई पीढ़ी अपनी नई सोच को सही जगह लगाए तो हर घर में खुशहाली बनी रहेगी।
सत्य घटना से मिला यह अनुभव कहानी बनकर सदैव अमर रहेगा।

9 thoughts on “नई सोच

  1. बिल्कुल सही प्रेरणावर्द्धक आपकी लेखनी 💯!
    वह युवा बहुत ही विद्वान मालूम हुआ! क्या गजब के संस्कार और सद्भावना से भरा उसका दिल! ऐसे इंसान विरले ही होते हैं!
    धन्यवाद जी एवं अनंत शुभकामनाएँ!

  2. सभी पाठकों का आभार-अभिनंदन, आप
    इसी तरह उत्साहवर्धन करते रहें
    -सुरेश परिहार, एडिटर, लाइव वॉयर न्यूज

  3. बहुत ही सुंदर कहानी है नयी पीढ़ी का नया रूप सामने लाया है आपने जो कि सकारात्‍मक है बधाई और अनेक शुभकामनाएं आपको

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