तेरी बिंदिया रे…..

जहां शायरों ने, कवियों ने, औरत की सुंदरता के लिए अनेकों उपमानों का प्रयोग किया है, जैसे झील सी गहरी आंखें, हिरण सी सुंदर आंखें, सुराही दार गर्दन, मोरनी सी चाल, वहीं एक प्रेमी, अपनी प्रेमिका की बिंदी पर मर मिटा है,और वह चाहता है कि चाहे वह और कोई श्रृंगार करें या ना करें ,सिर्फ एक छोटी सी बिंदी वह अपने माथे पर लगा ले, और उसे किसी भी उपमान की जरूरत नहीं होगी।

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नई सोच

आज की युवा पीढ़ी पर अक्सर आलोचना की जाती है—संस्कारहीन, आधुनिक जीवनशैली में खोई, और नशे-जुए जैसी बुरी आदतों में फंसी। लेकिन एक बस यात्रा में 25 वर्षीय युवक से हुई बातचीत ने इस सोच को पूरी तरह बदल दिया। युवक की ईमानदारी, जिम्मेदारी और संवेदनशीलता देखकर पता चला कि नई पीढ़ी में भी सम्मान, समझ और संस्कार गहराई से भरे हैं। यह अनुभव न केवल प्रेरणादायक था, बल्कि सोचने पर मजबूर करने वाला भी।

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कल, और आज़

कल और आज़—दोनों समय की धुरी पर खड़े हैं। जो पल बीत गया, वह केवल स्मृति है, खट्टे-मीठे अनुभवों और तीखे शब्दों से भरा हुआ। वह कल मेरा प्रारब्ध नहीं बन सका, इसलिए उसे थामे रहना व्यर्थ है। आज़, जो अभी मेरी साँसों में धड़क रहा है, वही सच्चा गीत है, वही वास्तविक उत्सव है। आज़ ही वह क्षण है जो मुझे आनंदित कर रहा है, जो मुझे जीने का कारण दे रहा है। इसलिए कल की ओर लौटकर पछताने से बेहतर है कि आज़ को पकड़कर जिया जाए।

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