
इलासिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार, लखनऊ
नंगी ईंट की दीवार
और उससे लगा चूल्हा,
उपले की आँच पर
सिकती रोटियाँ।
हालाँकि माँ के पास चिमटा है, फिर भी
कभी-कभी ‘हामिद’ बन जाने को मन करता है,
चूल्हे के पास गुजरती
उसकी तपती ज़िंदगी से कुछ पल चुराने को मन करता है।
अपनी गफलत में मुझे कभी पता तो नहीं चला, फिर भी
उसकी आँखों में छिपे सपने जानने को मन करता है।
समय जा चुका है पर
जो न पूछ सके, उन आँसुओं को पोछने को मन करता है।
उसकी खुरदरी हथेलियाँ, एड़ियाँ…
उसके वजूद पर लिपटी सारी सिलवटें
अपनी उँगलियों के पोरों से सहलाकर…
उसे फिर से मेरे बचपन की वो ही माँ बनाने को मन करता है।

बहुत सुंदर रचना
आभार मधु जी।
मां का सजीव चित्रण।
अति कोमल भावनाओं को शब्द देने के लिए ढेरों बधाई व शुभ कामनांए, इला जी
दीपक शर्मा
आपके प्रोत्साहन युक्त शब्द हौसला बढ़ा देते हैं,मै’म। आत्मीय आभार, अभिनंदन 🙏🏻
कोमल मन की याद रह जाने वाली कविता।
Bahut sundar 👌🙏🏻
आपके प्रोत्साहन युक्त शब्द हौसला बढ़ा देते हैं,मै’म। आत्मीय आभार, अभिनंदन 🙏🏻
माँ के प्रति कोमल भाव और संवेदना से भरी रचना के लिए आपको हार्दिक बधाई इला जी . मन के कोमलतम तारों को छू गई आपकी रचना.
आपके दिल तक रचना पहुँची इसके लिए दिल से आभार व्यक्त करती हूँ ,नीलम जी ! बहुत शुक्रिया 🌷🙏🏻