तेरी यादों का सैलाब

मानसिंह “शरद” उज्जैन

तेरी यादों का सैलाब उठा जाता है
कतरा कतरा आंखों से बहा जाता है
इश्क और खुदा में अंतर नहीं कोई
जर्रे जर्रे में नूर नज़र तेरा आता है।

अपनी जुल्फों से बहारें महकाती हो
इंद्रधनुष की तरह चूनर लहराती हो
चांदनी रात में मधुशाला सी तुम
जितना भूलता उतना याद आती हो

आंखे मिली इश्क की शुरुआत हो गई
होंठ क्या हिले रूमानी बात हो गई
गुस्से में आना और फिर रो पढ़ना तेरा
चिलचिलाती धूप में बरसात हो गई

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *