इल्तज़ा

पंख थक गए हैं, तो एक बार मिलने आ जाओ। मैं भी कभी स्वच्छंद पंछी जैसा था। आंसुओं के समंदर को मत रोको, उन्हें वैसे ही बहने दो जैसे सावन की झड़ी बहती है। लिखे हुए खतों की सौगात शायद कोई लौटाए, लेकिन वही कमाल का जिगर ए यार होगा, जैसा मैं हूं। किताबों पर धूल जमने से कहानी नहीं बदलती, और मैं भी कभी पुरानी किताबों को पढ़ने जैसा हूं। आज तक कौन गया है इस मिट्टी के आगे? मैं भी उस धूल के मुख़्तसर ज़र्रे जैसा हूं। जानते हैं, लौटते वक्त कुछ भी साथ में नहीं ले जा सकते, फिर भी बचा लो यारों, थोड़ा सरण और कफ़न जैसा…

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तेरी यादों का सैलाब

तेरी यादें जब भी उठती हैं तो सैलाब-सी बनकर मन को बहा ले जाती हैं। आँखों से आँसुओं के कतरे ढलते हैं, और हर कण में तेरा ही नूर झलकता है। तू अपनी जुल्फ़ों से बहारों को महकाती है, इंद्रधनुष-सी रंगीन चूनर लहराती है और चांदनी रातों को मधुशाला बना देती है। जितना तुझे भूलने की कोशिश करता हूँ, उतनी ही गहराई से तू याद आती है।

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