वो जो गुलज़ार थी …

इलासिंह, प्रसिद्ध साहित्यकार, लखनऊ

वो जो गुलज़ार थी मेरे कच्चे सपनों से,
नैहर की छत पर बनी कोठरी,
जिसकी छत की कड़ियों पे लिखी थीं
न जाने कितनी मुलायम, कोमल कहानियाँ।
दीवारों पर चिपका आई थी, कुछ दिल की मीठी बात
कह आई थी दीवारों से, दीवारों के भी होते कान
खूँटियों पर टाँगी थीं, कच्चे भुट्टों-सी ख़्वाहिशें
चूने से पुती दीवार की, ईंटों की दरारों में
छिपा आई थी जो बचकानी-सी कविताएँ,
अब जाने पर, ढूँढे नहीं मिलतीं…
कितना कुछ छोड़ा था,
दरवाज़ों पर अपनी हथेलियों की थाप
खिड़की से झाँकती वो
बिना मतलब कभी उदास,
कभी खुश, राह तकती-सी नज़र
आँगन में छोड़ आई थी अपनी
खिलखिलाहटों की गूँज,
ज़ीने में दौड़ते कदमों की
धप-धप थाप,
अपने कदमों की छाप छोड़ी थी न?..
दो मंज़िले की दो छतों को मिलाने वाली
उस सँकरी-सी दीवार पर,
जिसके एक सिरे से दूसरे सिरे को
दौड़कर एक साँस में पार करते थे दी और मैं
“आज मरोगी, तुम दोनों”
दीवार के एक तरफ आँगन से गाली देती दादी
और दूसरी तरफ बगल से गुज़रती गली से
लोगों की कौतुक भरी बेधती नज़रें,
वो सँकरी दीवार तो अभी वहीं है
बस अब उस पर दौड़कर कोई नहीं जाता,…
और छत पर बनी कोठरी
जहाँ छिपाकर आई थी कच्ची उम्र की न जाने
कितनी बेवकूफ़ियाँ
वो छिपकर कच्ची अमिया खाने की जगह थी तो
‘छिद्दा‘ की परतों में कटी कुल्फ़ी भी बरगद के पत्तों पर रख खाने की मुफ़ीद जगह
माँ-दादी से छिपाकर न जाने कितनी किताबें,
पच्चीस पैसे किराए से वहीं पढ़ी थीं….
सहेली और दी के साथ मिलकर कितनी तो बातें, बहसें,
ज़माने को बदलने की बेवकूफ़ ख़्वाहिशें…
हाँ,..वो जो गुलज़ार थी मेरे कच्चे सपनों से
नैहर की छत पर बनी कोठरी
अब वहाँ टूटी छत और
लटकी शहतीरें हैं
और लटकी शहतीरों पर…
कुछ,
कच्चे सपने हिलगे हैं.

11 thoughts on “वो जो गुलज़ार थी …

    1. आदरणीय साथियों मुझे इस बात की खुशी है कि आप सभी लोग एक-दूसरे की रचनाओं को पढ़ते हैं और अपनी राय व्यक्त करते हैं. इसी तरह से वरिष्ठ साथी, नवोदित रचनाकारों को प्रोत्साहित करते रहें और समय-समय पर मार्गदर्शन करते रहें. आप अपनी रचनाएं नियमित रूप से भेज कर सहयोग करते रहें.
      सुरेश परिहार, लाइव वॉयर न्यूज

      1. सच में कच्ची उम्र की बेवकूफ़ियाँ
        अब स्मृतियों का ख़ज़ाना हैं, सुंदर अनुभूतियों से सज्जित रचना। बधाई आपको!

  1. आपकी कविता पढ़ते हुए बचपन की कच्ची कहानियां आंखों के आगे आ गईं। स्मृतियों की अपनी कविता। खूब बधाई आपको इला जी।,👏

    1. बहुत ही अच्छी कविता।
      अपने जीवन के किसी भी एक चरण में हम सभी यही महसूस करते हम से कुछ ऐसा छूटा रहा है जो किसी एक समय में हमारी ‘कच्ची ख्वाहिशों’ में शामिल रहा था।
      ढेरों बधाई व शुभ कामनांए, इला जी
      दीपक शर्मा

    2. नितान्त बचपन से साक्षात्कार कराती कविता।बधाई हो इला सिंह।

  2. कच्ची उम्र के कच्चे सपने , छत पर बनी कोठरी में कुछ वर्जित उपन्यास, किताबें छुपाना, कच्ची अमिया छुपाकर खाना , मां – दादी की डांट से मोहल्ले भर का जासूस बनना ….
    लेखिका ने हर घर की दीवार के पार कैसे जाना एक सी खुशियां , एक सी फिक्रें , एक सा डांटना
    बहुत ही सुन्दर चित्रण किया है , इला सिंह जी

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