टूटते ख्वाबों की ग़ज़ल

रात का सन्नाटा, जरा सी नींद लगी, उफ्फ़,
आज किसने फिर से ये नींद में खलल डाला?

रात भर दिल रोया, चाँद रोया, मुकद्दर भी,
ये किसने आज होसलों पर पर्दा डाला?

इत्र सी सुगंध, गुलशन में फूल, हजार ए खुदा,
तितलियों के पंखों पर तूने कौन सा रंग डाला?

मजबूरियों की मानिंद है ये गीत जिंदगी का,
जिंदगी को क्यों कर ग़ज़ल कह डाला।

कैसे नजाकत से आगोश में सजाए थे लम्हे,
किस जालिम ने उन्हें बेनकाब कर डाला?

डॉ. नेत्रा रावणकर, प्रसिद्ध लेखिका, उज्जैन (मध्यप्रदेश)

2 thoughts on “टूटते ख्वाबों की ग़ज़ल

  1. वाह वाहहहहहहह बहुत खूब नेत्रा जी 👌👏

  2. वाह बहुत सुंदर अभिव्यक्ति
    इत्र सी सुगंध, गुलशन में फूल, हजार ए खुदा,
    तितलियों के पंखों पर तूने कौन सा रंग डाला?
    जिन्दगी का सही आंकलन

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