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ओ पारिजात

रात गहरी हो रही है और हवा में पारिजात की सुगंध घुल रही है। मैं जागता हूँ और कविताएँ लिखता हूँ, पर शब्द अब इस खुशबू में मदहोश होने लगे हैं। मैं रंगों की सुंदरता नहीं चाहता .मुझे तो प्रेम का वही लाल रंग चाहिए जो आत्मा को महका दे। मैं चाहता हूँ कि मैं पारिजात के आँगन की उसी मिट्टी में बो दिया जाऊँ, और वहीं लगातार महकता रहूँ। इस सिंदूरी भोर में, एक स्पर्श भर से मेरी कविता फिर जीवित हो उठी है।

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नवल चाँद

शरद पूर्णिमा की वह रात सचमुच अद्भुत थी। आकाश में श्वेत रंग का धवल, नवल चाँद अपने पूरे तेज और सौंदर्य के साथ चमक रहा था। रात्रि अपने चरम पर थी, और उसी चरम पर वह पूर्ण चाँद था—निर्मल, चंचल, अद्भुत। ऐसा लगता था मानो प्रकृति स्वयं नवजीवन का स्वागत कर रही हो। वातावरण में एक अनकही शांति थी, जो भीतर तक उतर जाती थी। हर कोई जैसे प्रभु के चरणों में ध्यानमग्न था, उस दिव्यता में खोया हुआ। सचमुच, उस रात का वह चाँद ईश्वर का वरदान था—श्वेत वर्ण का, नवल और परम सुंदर चाँद।

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“मौन दरिया, बोलती रात”

यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है

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टूटते ख्वाबों की ग़ज़ल

गहन भावनाओं और रात के सन्नाटे के माध्यम से जीवन की नाजुकताओं और बेचैनियों को बयान करती है। लेखक की नींद में खलल डालने वाली घटनाओं के माध्यम से यह व्यक्त किया गया है कि किस तरह अचानक आने वाली परिस्थितियाँ हमारी मानसिक शांति और हौसलों पर असर डालती हैं। रात भर दिल और चाँद दोनों रोते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का मिश्रण प्रस्तुत करता है। “इत्र सी सुगंध” और “तितलियों के पंखों पर रंग” जैसी छवियाँ जीवन की सुंदरता और नाजुकता को दर्शाती हैं, 

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धूप आती है….

सांझ ढलते ही मन बोझिल हो उठता है। लौटते परिंदों की फुर्ती और घोंसले तक पहुँचने की चाह सिखाती है कि ठिकाना ही असली सुकून है। लेकिन यह सांझ अब न गले लगाती है, न मुस्कान भरती है—बस तन चलता रहता है और मन सूखे पत्तों-सा झरता है। खाने की मेज़ पर अब बर्तनों का कोई राग नहीं, न ही निवालों की कोई चिरौरी। पेट भरना भी बस एक कवायद रह गया है। फिर भी गलियारों से आती धूप पतझड़ से मन को बसंत की ओर ताकने पर मजबूर कर देती है। आँखों से बहता नमकीन पानी चुपचाप तकिए में समा जाता है। सुबह आती है, थकी-हारी, पर वही रोज़मर्रा की भागदौड़ मन को थोड़ी राहत देती है। दिन के उजाले में नए चेहरे और कहानियाँ मिलती हैं, और धीरे-धीरे सांझ से रात तक का मलाल भी उतरने लगता है।

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