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“मौन दरिया, बोलती रात”

यह कविता एक गहरे आत्ममंथन का चित्रण है, जिसमें कवि अपनी भावनाओं को अभिव्यक्त करने की जद्दोजहद से गुजर रहा है। वह सोचता है कि आखिर क्या कहे, किससे कहे और कितना कहे, क्योंकि कहने की भाषा तक मौन हो चुकी है। जीवन में ऐसा सन्नाटा है जहाँ शरीर के अंग सुन्न पड़ चुके हैं और चारों ओर उदासीनता छाई है। कवि प्रश्न उठाता है कि किसके पास कितना “पानी” बचा है और किसे उसकी परवाह है। हर कोई अपनी ही धुन में, अपने ही राग में व्यस्त है। जीवन बस एक बहती हुई धारा की तरह है, जो मौन रहते हुए भी अपनी कहानी कहती जाती है।
दरिया का सन्नाटा भी मानो संदेश देता है कि कहीं ठहरना मत, आगे बढ़ते रहना। इस अंतर्द्वंद्व में कवि सोचता है कि दरिया से भी आखिर क्या कहा जाए, क्योंकि यहाँ तो भाषा भी मौन है और कोई किसी का नहीं है

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टूटते ख्वाबों की ग़ज़ल

गहन भावनाओं और रात के सन्नाटे के माध्यम से जीवन की नाजुकताओं और बेचैनियों को बयान करती है। लेखक की नींद में खलल डालने वाली घटनाओं के माध्यम से यह व्यक्त किया गया है कि किस तरह अचानक आने वाली परिस्थितियाँ हमारी मानसिक शांति और हौसलों पर असर डालती हैं। रात भर दिल और चाँद दोनों रोते हैं, जो मानवीय संवेदनाओं का मिश्रण प्रस्तुत करता है। “इत्र सी सुगंध” और “तितलियों के पंखों पर रंग” जैसी छवियाँ जीवन की सुंदरता और नाजुकता को दर्शाती हैं, 

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